88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- उन्हें साफ लग रहा था कि इस व्यवस्था से भी के कल्याण की आशा तो नहीं
की जा सकती, बल्कि इससे सबका हितसाधन भी नहीं हो सकता। वास्तव में
कुछ लोगों की स्वार्थपूर्ति के लिए ही जान-बूझकर इसका निर्माण इस प्रकार
किया गया। इसमें अपनी ही तरह से बने अतिमानव (Super man) वर्ग की सेवा
के लिए आदमी को तैयार किया गया था।
- कमजोर को दबाकर और उनका शोषण कर उन्हें पूर्ण दासता में रखने के उद्देश्य
से ही इसका निर्माण किया गया था।
- बुद्ध ने सोचा कि ब्राह्मणों का कर्म-सिद्धांत विद्रोह की भावना को पूर्णतः समाप्त
करने के लिए बनाया गया था। आदमी के दुःख का कारण स्वयं आदमी के
अलावा कोई नहीं था। विद्रोह दुःख की अवस्था नहीं बदल सकता क्योंकि दुःख
उसके पूर्व-जन्म के कर्मों द्वारा ही निर्धारित है।
- दो वर्गों-शूद्र और स्त्रियाँ, जिनकी मानवता को ब्राह्मणवाद ने छिन्न-भिन्न कर
दिया था, उनमें इस व्यवस्था का विरोध करने की कोई शक्ति नहीं थी।
- वे ज्ञान प्राप्ति के अधिकार से वंचित कर दिए गए। इसका दुष्परिणाम यह
हुआ कि जबरदस्ती अज्ञानता के कारण वे यह नहीं समझ पाए कि उनकी
यह निम्न-स्तर की हालत कैसे पैदा हुई। वे जान नहीं पाए कि ब्राह्मणवाद ने
उनके जीवन के महत्त्व को किस प्रकार पूर्णतः दलित बना डाला। ब्राह्मणवाद
के खिलाफ विद्रोह करने की बजाय, वे उसके सेवक और समर्थक बन गए।
- स्वतंत्रता प्राप्ति को निमित्त शस्त्र उठाने का अधिकार आदमी का अंतिम साधन
है। लेकिन शूद्रों से हथियार उठाने का भी अधिकार छीन लिया गया था।
- ब्राह्मणवाद के अन्तर्गत स्वार्थी ब्राह्मणों, शक्तिशाली व क्रूर व्यक्तियों और धनी
वैश्यों के षडयन्त्र के शिकार होने के लिए बेचारे शूद्रों को निःसहाय छोड़ दिया
गया।
- क्या इसे सुधारा जा सकता था? बुद्ध जानते थे कि तथाकथित ईश्वर द्वारा बनाई
गई सामाजिक व्यवस्था में सुधार नहीं हो सकता था और इसका अंत नहीं किया
जा सकता था।
- इन्हीं कारणों से बुद्ध ने ब्राह्मणवाद को जीवन के सच्चे मार्ग का विरोधी बताकर
अस्वीकार कर दिया।