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4. उपनिषद् और उनकी शिक्षाएँ
- उपनिषद् भी वैदिक-वाड्.मय का हिस्सा माने जाते हैं। ये वेदों के भाग नहीं
हैं। यह धर्म-वैधानिक प्रमाण नहीं है।
इतना होने पर भी वे धार्मिक साहित्य के ही अंग हैं।
उपनिषदों की संख्या काफी अधिक है। कुछ महत्वपूर्ण और कुछ एकदम
महत्त्वहीन हैं।
उनमें से कुछ वैदिक विचारकों एवं ब्राह्मण पुरोहितों के विरुद्ध थे।
वे सभी इस बात से सहमत थे कि वैदिक अध्ययन ‘अविद्या’ का ही अध्ययन
है।
- वे सभी सहमत थे कि वेदों और वैदिक विज्ञान का अध्ययन घटिया कोटि का
है।
- वे सभी वेदों की दिव्य उत्पत्ति पर प्रश्न-चिह्न लगाने के पक्ष में थे।
- वे सभी यज्ञ, श्राद्ध और पुरोहितों के दान के प्रभाव को अस्वीकार करने के
लिए सहमत थे, जो कि ब्राह्मण-दर्शन के मूल सिद्धांत हैं।
- फिर भी यह उपनिषदों का मुख्य विषय नहीं था। उनके वाद-विवाद का मुख्य
विषय है-ब्रह्म और आत्मा।
- ब्रह्म एक सर्वव्यापी तत्व है, जो विश्व को एकत्व में बाँधे हुए है और आदमी
की मुक्ति भी इसी में है कि उसकी आत्मा को इस बात का बोध हो जाए कि
वह भी ब्रह्म है।
- उपनिषदों की मुख्य अभिधारणा थी कि ब्रह्म ही सत्य है और आत्मा ब्रह्म का
अंश होने के कारण उसके समान है। उपाधियों में जकड़े होने के कारण आत्मा
को बोध नहीं होता कि वह ब्रह्म है।
- प्रश्न था-क्या ब्रह्म सत्य है? उपनिषद् की अभिधारणा की स्वीकृति इसी प्रश्न
के उत्तर पर निर्भर करती है।
- ‘ब्रह्म सत्य है’ इस अभिधारणा के समर्थन में बुद्ध को कोई प्रमाण नहीं मिल
सका। इसलिए, उन्होंने उपनिषदों की अभिधारणा को अस्वीकार कर दिया। 14. ऐसा नहीं है कि इस बारे में उपनिषदों के रचयिताओं से प्रश्न नहीं पूछे गए
थे।