2. बुद्ध का पहला प्रवचन - Page 137

108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘हे परिव्राजको, इस बात को जानिए, कि ये दो अतियाँ हैं, जिनका मनुष्य

को पालन नहीं करना चाहिए-एक ओर उन वस्तुओं की स्थायी आसक्ति,

जिनका आकर्षण काम-वासनाओं और विशेषकर विषयासक्ति पर निर्भर करता

है-यह सन्तुष्टि प्राप्त करने का एक निम्न और विधर्मी मार्ग है, जो अयोग्य

है, अलाभदायक है, अतः स्थायी आदत बुरी है, और दूसरी ओर तपश्चर्या एवं

काय-क्लेष है जो कष्टदायक, अयोग्य और अलाभदायक है।’’

  1. ‘‘एक मध्यम-मार्ग है, जो दोनों अतियों से बचता है। आप जानिए, कि यही

वह मार्ग है, जिसका मैं उपदेश देता हूँ।’’

  1. पाँचों परिव्राजकों ने उनको ध्यान से सुना। यह न समझते हुए कि बुद्ध के

मध्यम-मार्ग के उत्तर में क्या कहा जाये, उन्होंने उनसे पूछा कि उनके द्वारा उन्हें

त्याग दिये जाने के उपरान्त वे क्या कर रहे थे। तब बुद्ध ने उन्हें बतलाया कैसे

वे गया के लिये चले, कैसे वे पीपल-वृक्ष के नीचे ध्यान में बैठे और कैसे चार

सप्ताहों के ध्यान के पश्चात् बोधि को प्राप्त किया, जिसके परिणामस्वरूप वे

जीवन के एक नये मार्ग को खोजने में सक्षम हुए थे।

  1. यह सुनकर, परिव्राजक यह जानने को कि वह मार्ग क्या था, अत्यन्त व्याकुल

हो गये और बुद्ध से उनके समक्ष उसकी व्याख्या करने की प्रार्थना की।

  1. बुद्ध सहमत हो गये।

  2. उन्होंने यह कहते हुए प्रारम्भ किया कि उनके मार्ग को, जो उनका धम्म है,

परमात्मा और आत्मा से कुछ लेना-देना नहीं, उनके धम्म का मृत्यु के उपरान्त

के जीवन से कोई सरोकार नहीं है। और न ही उनके धम्म का कर्म-काण्डों

और धर्मानुष्ठानों से कोई सम्बन्ध है।

  1. उनके धम्म का केन्द्र मनुष्य और पृथ्वी पर अपने जीवन में मनुष्य का मनुष्य

से सम्बन्ध है।

  1. उन्होंने कहा कि यह उनकी पहली अभिधारणा है।

  2. उनकी दूसरी अभिधारणा है कि मनुष्य दुःख से, कष्ट और दरिद्रता में जीवन

व्यतीत कर रहे हैं। संसार दुख से भरा हुआ है और कैसे संसार में इस दुःख

को हटाया जाये यही धम्म का एकमात्र उद्देश्य है। धम्म इसके अतिरिक्त और

कुछ नहीं है।

  1. दुख के अस्तित्व की स्वीकृति और दुख को हटाने का मार्ग दर्शाना ही उनके

धम्म का आधार एवं मूल है।