3. बुद्ध का पहला प्रवचन (जारी) - Page 138

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  1. यह ही धम्म का एकमात्र आधार एवं औचित्य हो सकता है। एक धम्म जो

इस बात को स्वीकार करने में असफल होता है किंचित धम्म ही नहीं है।

  1. ‘‘वस्तुतः परिव्राजको! जो कुछ भी श्रमण या ब्राह्मण (अर्थात् धर्म के प्रचारक)

नहीं समझ पाते, जैसा वह वास्तव में है कि संसार में दुःख और उससे छुटकारा,

ही धम्म की मुख्य समस्या है, ऐसे श्रमण और ब्राह्मण मेरे विचार में श्रमण या

ब्राह्मण के रूप में स्वीकारे जाने चाहिये, और न ही वे मानवीय लोग स्वयं ही

पूर्णतया यह जान पाये हैं कि जो कुछ भी यह जीवन है धम्म का वास्तविक

धम्म है।’’

  1. तब परिव्राजकों ने उनसे पूछा, ‘‘यदि आपके धम्म का आधार दुःख के अस्तित्व

की स्वीकृति और दुःख को हटाना ही है, तो हमें बतायें आपका धम्म कैसे

दुःख को हटा सकता है।’’

  1. तब बुद्ध ने उनसे कहा कि उनके धम्म के अनुसार यदि प्रत्येक व्यक्ति (1)

पवित्रता के पथ, (2) धम्मपरायणता के पथ, और (3) नैतिकता के पथ का

पालन करे, तो यह सभी दुखों के अन्त कर पाएंगे।

  1. और उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने ऐसे धर्म को खोज लिया है।

3. बुद्ध का पहला प्रवचन (जारी)

शुद्धता का मार्ग

  1. तब परिव्राजकों ने बुद्ध से उन्हें अपने धम्म की व्याख्या करने का निवेदन

किया।

  1. और बुद्ध ऐसा करने के लिये प्रसन्न हुए।

  2. उन्होंने सर्वप्रथम उन्हें शुद्धता का मार्ग ही समझाया।

  3. उन्होंने परिव्राजकों से कहा, ‘‘शुद्धता का मार्ग सिखलाता है कि एक व्यक्ति

जो भला बनना चाहता है, अवश्य ही कुछ सिद्धान्तों को जीवन के सिद्धान्तों

के रूप में स्वीकार करे।

  1. ‘‘मेरे शुद्धता के मार्ग के अनुसार इसके द्वारा स्वीकृत जीवन के सिद्धान्त हैं।

किसी प्राणी को घायल या उसकी हत्या न करना_ चोरी न करना या किसी

भी ऐसी वस्तु को अपनी न बना लेना, जो दूसरे की हो_ असत्य न बोलना_

कामुकता में आसक्त न होना_ नशीले पेय पदार्थों का सेवन न करना।’’