110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘मैं कहता हूँ, इन सिद्धान्तों को स्वीकार करना, प्रत्येक व्यक्ति के लिये अत्यन्त
आवश्यक है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के लिये एक मानदण्ड अवश्य होना चाहिये,
जिससे वह जो कुछ भी करता है उसे माप सके और मेरी शिक्षाओं के अनुसार
ये सिद्धान्त मापदण्ड का निर्धारण करते हैं।’’
- ‘‘प्रत्येक स्थल पर ऐसे व्यक्ति हैं, जो पतित (गिरे हुए) हैं। किन्तु पतितों की
दो श्रेणियाँ हैंः ऐसा पतित जिसके पास एक मानदण्ड है और दूसरा पतित
जिसके पास कोई मापदण्ड नहीं है।’’
- ‘‘ऐसा पतित जिसके पास कोई मानदण्ड नहीं है, यह नहीं जानता कि वह
गिरा हुआ है। परिणामस्वरूप वह सदैव पतित ही रहता है। दूसरी ओर एक
पतित जिसके पास एक मानदण्ड है, वह अपनी पतित अवस्था से ऊपर उठने
का प्रयास करता है। क्यों? उत्तर यह है, क्योंकि वह जानता है कि वह पतित
है।’’
- ‘‘मनुष्य के जीवन को नियन्त्रित करने के लिये एक मानदण्ड होने और कोई
मापदण्ड न होने के मध्य यही भेद है। जिस बात से फर्क पड़ता है, वह यह
नहीं है कि व्यक्ति का पतन कितना अधिक हुआ है, बल्कि किसी मापदण्ड
की अनुपस्थिति है।’’
- ‘‘हे परिव्राजको! तुम पूछ सकते हो कि क्यों वे सिद्धान्त जीवन के एक मापदण्ड
के रूप में स्वीकार करने के योग्य हैं।’’
- ‘‘इस प्रश्न का उत्तर तुम स्वयं ही पा जाओगे, यदि तुम स्वयं से ही यह पूछो
ः क्या वे सामाजिक हित को प्रोत्साहित करते हैं?’’
- ‘‘यदि इन प्रश्नों के तुम्हारे उत्तर सकारात्मक हैं, तो इसका अर्थ है कि मेरे
शुद्धता के मार्ग के सिद्धान्त जीवन के एक सच्चे मापदण्ड को निर्धारित करने
के लिये स्वीकार करने के योग्य हैं।’’
4. बुद्ध का पहला प्रवचन (जारी)
आष्टांगिक मार्ग या सम्यक् मार्ग
- बुद्ध ने उसके पश्चात् परिव्राजकों को आष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया। उन्होंने
कहा कि आष्टांगिक मार्ग के आठ भाग हैं।
- उन्होंने अपना उपदेश सम्मा दिट्ठी (सम्यक् दृष्टि) की व्याख्या से प्रारम्भ किया,
जो आष्टांगिक मार्ग का प्रथम और प्रमुख अंग है।