111
- ‘‘सम्मा दिट्ठी (सम्यक-दृष्टि) के महत्त्व को समझने के लिये,’’ बुद्ध ने
परिव्राजकों से कहाः-
- ‘‘हे परिव्राजको! तुम्हें अवश्य समझ लेना चाहिये कि संसार एक कारागार
(जेल) है और व्यक्ति कारागार का एक बन्दी है।’’
- ‘‘यह कारागार अन्धकार से परिपूर्ण है। यह इतना अन्धकारमय है कि कठिनाई
से ही कोई वस्तु बन्दियों द्वारा ठीक से देखी जा सकती है। बन्दी यह भी नहीं
देख सकता है कि वह बन्दी है।’’
- ‘‘निस्सन्देह, व्यक्ति अन्धकार में अत्यधिक लम्बे समय तक रहने के कारण न
केवल अन्धा हो गया है, बल्कि उसे इसमें अत्यन्त सन्देह है कि प्रकाश जैसी
किसी आश्चर्यजनक वस्तु का कभी भी अस्तित्व भी हो सकता है।’’
- ‘‘मन ही केवल ऐसा साधन है, जिसके द्वारा प्रकाश व्यक्ति के पास आ सकता
है।’’
- ‘‘किन्तु इन कारागा-वासियों का मन किसी भी तरह इस उद्देश्य की पूर्ति के
लिये एक सही साधन नहीं है।’’
- ‘‘यह केवल एक अल्प मात्रा में प्रकाश को आने देता है, केवल इतना ही
जिससे कि जिनके पास दृष्टि है वे यह देख सकें कि अन्धकार जैसी एक वस्तु
वहाँ है।’’
‘‘अतः इस प्रकार की समझ अपनी प्रकृति में दोषपूर्ण है।’’
‘‘किन्तु जानो, हे परिव्राजकों! बन्दियों की स्थिति इतनी निराशाजनक नहीं है,
जितनी प्रतीत होती है।’’
- ‘‘क्योंकि व्यक्ति में ऐसी वस्तु है, जिसे इच्छा-शक्ति कहते हैं। जब उपयुक्त
उद्देश्य उत्पन्न होते हैं, तब इच्छा-शक्ति को जागृत किया जा सकता है और
क्रियाशील बनाया जा सकता है।’’
- ‘‘केवल इतना प्रकाश आने से, जिससे यह देखा जा सके कि इच्छा-शक्तियों
को किस दिशा में अग्रसर करने की आवश्यकता है, व्यक्ति उसे इस प्रकार
निर्देशित कर सकता है, जिससे कि वे मुक्ति की ओर ले जा सके।’’
- ‘‘अतः यद्यपि व्यक्ति बँधा हुआ है, तब भी वह मुक्त हो सकता है, वह किसी
भी समय कदम उठाना प्रारम्भ कर सकता है जो अन्ततोगत्वा उसे मुक्ति तक
ला सकेंगे।’’