112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘ऐसा इसलिये है, क्योंकि जिस किसी भी दिशा में जिसे कोई चुनता है,
मस्तिष्क को प्रशिक्षित करना सम्भव है। यह मस्तिष्क ही है, जो जीवन के गृह
में हमें बन्दी बनाता है, और यह मस्तिष्क है, जो हमें उसी स्थिति में बनाये
रखता है।’’
- ‘‘किन्तु मन ने जिसे बनाया है, वहीं मन उसे समाप्त भी कर सकता है। यदि
इसने व्यक्ति को बन्धन तक पहुँचाया है, तो यही जब ठीक प्रकार से निर्देशित
किया जायेगा, तो उसे मुक्ति तक भी ला सकता है।’’
‘‘यही है, जिसे सम्मा दिट्ठी कर सकती है।’’
‘‘सम्मा दिट्ठी का लक्ष्य क्या है?’’ परिव्राजकों ने पूछा बुद्ध ने उत्तर दिया,
‘‘अविज्जा (अविद्या) का विनाश है। यह मिच्छा दिट्ठी (मिथ्या दृष्टि) की
विरोधी है।’’
- ‘‘और अविद्या का अर्थ आर्य सत्यों, दुख के अस्तित्व और दुख के निवारण
को जानने की असफलता है।’’
- ‘‘सम्मा दिट्ठी को कर्म-काण्डों और रीति-रिवाजों के महत्त्व पर विश्वास को
त्यागने और शास्त्रों की पवित्रता पर अविश्वास करने की आवश्यकता होती
है।’’
- ‘‘सम्मा दिट्ठी को अन्धविश्वास और अलौकिकता के परित्याग की आवश्यकता
होती है।’’
- ‘‘सम्मा दिट्ठी को ऐसी सभी धारणाओं के परित्याग की आवश्यकता होती है,
जो बिना किसी तथ्य या अनुभव के आधार पर निराधार कल्पनायें मात्र हैं।’’
‘‘सम्मा दिट्ठी को स्वतंत्र मन और स्वतंत्र विचार की आवश्यकता होती है।’’
‘‘प्रत्येक व्यक्ति के कुछ लक्ष्य, आकांक्षाएँ और महत्वाकांक्षायें होती हैं। सम्मा
संकप्पो (सम्यक-संकल्प) यह शिक्षा देता है कि ऐसे लक्ष्य, आकांक्षायें और
महत्वाकांक्षायें उच्च और प्रशंसनीय होनी चाहिए न कि हेय और अयोग्य।’’
- ‘‘सम्मा वाचा (सम्यक् वाचा) शिक्षा देता हैः (1) कि मनुष्य को केवल
वहीं बोलना चाहिये, जो सत्य है, (2) कि मनुष्य को वह नहीं बोलना चाहिये,
जो असत्य है, (3) कि मनुष्य को दूसरों के विषय में बुरी बातें नहीं बोलनी
चाहिये, (4) कि मनुष्य को झूठी निन्दा से बचना चाहिये, (5) कि मनुष्य
को अन्य साथी मनुष्यों के प्रति क्रोधी और अपमानजनक भाषा का प्रयोग नहीं