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करना चाहिये, (6) कि मनुष्य को सभी के साथ विनम्रतापूर्वक और शिष्टता
के साथ बोलना चाहिये, (7) कि मनुष्य को निरर्थक, मूर्खतापूर्ण बातों में मग्न
नहीं होना चाहिये, बल्कि अपनी वाणी को तर्कसंगत और उद्देश्यपूर्ण बनाना
चाहिये।’’
- ‘‘सम्यक् वाणी (सम्मा वाचा) वह व्यवहार, जैसा कि मैंने समझाया है, भय या
पक्षपात का परिणाम नहीं होना चाहिये। इसका इस बात से नगण्यतम सम्बन्ध
भी नहीं होना चाहिये कि उसके कार्यों के विषय में कोई श्रेष्ठ व्यक्ति क्या
सोचेगा या सम्यक् वाणी के व्यवहार से उसकी क्या हानि हो सकती है।’’
- ‘‘सम्यक् वाणी का माप-दण्ड न तो किसी श्रेष्ठ व्यक्ति की आज्ञा है, न ही
किसी व्यक्ति को हो सकने वाला व्यक्तिगत लाभ है।’’
- ‘‘सम्मा कमन्तो (सम्यक-कमन्ति) समुचित व्यवहार की शिक्षा देता है। वह
शिक्षा देता है कि प्रत्येक कर्म भावना और दूसरों के अधिकारों के सम्मान पर
आधारित होना चाहिए।’’
- ‘‘सम्मा कमन्तो के लिये माप-दण्ड क्या है? माप-दण्ड वह आचार मार्ग है,
जो जीवन के मूलभूत नियमों के साथ सर्वाधिक समन्वय रखता है।’’
- ‘‘जब किसी व्यक्ति के कार्य इन नियमों के साथ समन्वय रखते हैं, तो सम्मा
कमन्तो के अनुसार माने जा सकते हैं।’’
- ‘‘प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीविका कमानी ही होती है। किन्तु अपनी जीविका
कमाने के लिये अनेक रास्ते ही रास्ते हैं। कुछ बुरे हैं, कुछ अच्छे हैं। बुरे रास्ते
वह हैं जो दूसरों को हानि या अन्याय पहुँचाते हैं। अच्छे रास्ते वे हैं जिनके
द्वारा कोई व्यक्ति दूसरों को हानि या अन्याय पहुँचाये बिना अपना जीविकोपार्जन
करता है। यह सम्मा अजीवो (सम्यक-आजीविका) है।’’
- ‘‘सम्मा व्यायामो (सम्यक्-व्यायाम) अविज्जा को हटाने का प्राथमिक प्रयाय है,
उस द्वार तक पहुँचाने और उसे खोलने का प्राथमिक प्रयास है, जो इस दुखद
कारागार से बाहर ले जाता है।’’
सम्यक् व्यायाम के चार उद्देश्य होते हैं-
‘‘पहला उन चित्त-प्रवृत्तियों को रोकना जो अष्टांग-मार्ग के प्रतिकूल हैं।
‘‘दूसरा ऐसी दूषित चित्त-वृत्तियों का दमन करना, जो पहले ही उत्पन्न हो गयी
हों।’’