114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘तीसरा ऐसी चित्त-प्रवृत्तियों को उत्पन्न करना, जो एक व्यक्ति को अष्टांग
मार्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक हो।’’
- ‘‘चौथा ऐसी शुभ एवं मानवीय चित्त-वृत्तियों का, जो पहले ही उत्पन्न हो गयी
हों और अधिक विकास एवं वृद्धि करना है।’’
- ‘‘सम्मा सति (सम्यक-स्मृति) सतर्कता और विचारशीलता को नियंत्रित करती
है। इसका अभिप्राय मन की सतत जागरूकता है। कुप्रवृत्तियों पर मन के द्वारा
निगरानी करना और रक्षा करना सम्मा सति का दूसरा नाम है।
- ‘‘हे परिव्राजको! ऐसे पाँच बन्धन या बाधायें हैं, जो सम्मा दिट्ठी व्यायामों और
‘सम्मा सति’ को प्राप्त करने का प्रयास करने वाले एक व्यक्ति के मार्ग में
आते हैं।
- ‘‘ये पांच बाधायें हैंः- लोभ, द्वेष, आलस्य एवं निष्क्रियता, सन्देह (विचिकित्सा)
और अनिश्चय। अतः इन बाधाओं पर नियन्त्रण करना आवश्यक है, जो वास्तव
में बाधायें हैं और इनको नियन्त्रित करने का तरीका समाधि है। किन्तु हे
परिव्राजको! यह जानों कि ‘सम्मा समाधि’ (सम्यक समाधि) समाधि के समान
नहीं है। यह पर्याप्त भिन्न है।’’
- ‘‘समाधि एकाग्रता मात्र है। निस्सन्देह यह उन ध्यान की अवस्थाओं की ओर
ले जाती है जो स्वप्रेरित हैं और पांचों बाधाओं को स्थगित रखती हैं।’’
- ‘‘किन्तु ध्यान की ये अवस्थायें अस्थायी हैं। अतः बाधाओं का स्थगन भी
अस्थायी है। जो आवश्यक है वह है चित्त का एक स्थायी परिवर्तन-ऐसा स्थायी
परिवर्तन सम्मा समाधि के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।’’
- ‘‘समाधि मात्र नकारात्मक है, क्योंकि इससे बाधाओं का अस्थायी स्थगन मात्र
होता है। इसमें चित्त का प्रशिक्षण सम्मिलित नहीं है। ‘सम्मा समाधि’ सकारात्मक
है। यह चित्त को एकाग्र करने और एकाग्रता के समय कुछ कुशल ‘कर्मों’ का
चिन्तन करने की शिक्षा देती है और इस प्रकार बाधाओं द्वारा उत्पन्न होने वाले
अकुशल ‘कर्मों’ की ओर चित्त को आकर्षित करने की प्रवृत्ति को दूर करती
है।’’
- ‘सम्मा समाधि’ चित्त को कुशल सोचने और सदैव कुशल ही कुशल सोचने की
एक आदत डाल देती है। ‘सम्मा समाधि’ चित्त को कुशल करने की आवश्यक
प्रेरक शक्ति प्रदान करती है।’