5. बुद्ध का पहला प्रवचन (जारी) - Page 144

115

5. बुद्ध का पहला प्रवचन (जारी)

शील का मार्ग

  1. तत्पश्चात् बुद्ध ने परिव्राजकों को शील (सद्गुणों) का मार्ग समझाया।
  2. उन्होंने उन्हें कहा कि शील के मार्ग का अभिप्राय इन सद्गुणों का पालन करना

हैः (1) शील, (2) दान, (3) उपेक्षा, (4) नैष्कम्य, (5) वीर्य, (6) क्षान्ति,

(7) सत्य, (8) अधिष्ठान, (9) करुणा, और (10) मैत्री। 3. परिव्राजकों ने बुद्ध से उन्हें यह बताने को कहा कि इन सद्गुणों का अभिप्राय

क्या है।

  1. तब बुद्ध उनकी इच्छा को सन्तुष्ट करने के लिये अग्रसर हुये।
  2. ‘‘शील है, नैतिक स्वभाव, अकुशल न करने के प्रवृत्ति और कुशल करने की

प्रवृत्ति, अकुशल करने में अपमानित अनुभव करना। दण्ड के भय से अकुशल

करने से बचना शील है। शील का अभिप्राय अकुशल करने से भय है।’’ 6. ‘नैष्क्रम्य’ का तात्पर्य संसार के भोग-विलासों का परित्याग है।’’ 7. ‘‘दान’ का अभिप्राय बदले में बिना कुछ पाने की आशा रखते हुए दूसरों के

भले के लिये अपनी सम्पत्ति, खून और शरीर के अंग और यहाँ तक कि अपने

प्राणों तक को दे देना है।’’

  1. ‘‘वीर्य’ सम्यक् प्रयास है। यह जो कुछ भी करने का तुमने दृढ़ निश्चय कर

लिया है, उसे अपनी पूरी सामर्थ्य से करना और जो कुछ भी करने का तुमने

दृढ़ निश्चय कर लिया है उससे पीछे हटने का एक भी विचार नहीं लाना

है।’’

  1. ‘‘क्षान्ति’ सहिष्णुता होता है। घृणा का उत्तर घृणा से न देना ही इसका सार है,

क्योंकि घृणा के द्वारा घृणा शान्त नहीं होती है। यह केवल सहिष्णुता द्वारा ही

शान्त हो सकती है।’’

  1. ‘‘सत्य’ सत्य का तात्पर्य झूठ न बोलना है। व्यक्ति को कभी झूठ नहीं बोलना

चाहिये। उसका कथन सदैव सत्य और सत्य के सिवा कुछ और नहीं होना

चाहिये।’’

  1. ‘‘अधिठान’ अपने लक्ष्य तक पहुंचाने का दृढ़ संकल्प होता है।’’
  2. ‘‘करुणा’ सभी मनुष्यों के प्रति दयाशीलता होती है।’’