116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘मैत्री’ सभी प्राणियों के प्रति, न केवल उसके प्रति जो एक मित्र है, बल्कि
उसके प्रति भी जो एक शत्रु है, अर्थात् न केवल मनुष्यों के प्रति, बल्कि सभी
सजीव प्राणियों के प्रति मैत्री भावना व सहानुभूति रखना है।’’
- ‘‘उपेक्षा’ अनासक्ति की भावना होती है और यह उदासीनता से होती भिन्न है।
यह चित्त की एक अवस्था है जहाँ न तो प्रिय है और न ही अप्रिय है। परिणाम
से अप्रभावित रहना और फिर भी उसके प्रयास में संलग्न रहना।’’
- ‘‘इन सद्गुणों का किसी भी व्यक्ति को अपने सम्पूर्ण सामर्थ्य से अभ्यास करना
चाहिये। इसीलिये इन्हें पारमिता (पराकाष्ठा की अवस्थाएं) कहा जाता है।’’
6. बुद्ध का पहला प्रवचन (जारी)
- अपने धर्म का उपदेश देकर और उसकी व्याख्या करने के पश्चात् बुद्ध ने
परिव्राजकों से पूछा-
- ‘‘क्या व्यक्तिगत पवित्रता संसार में भलाई का आधार नहीं है?’’ और उन्होंने
उत्तर दिया, ‘‘जैसा आपने कहा यह ऐसा ही है।’’
- और बुद्ध ने आगे कहा ‘‘क्या व्यक्तिगत पवित्रता को द्वेष, रोग, अज्ञान, जीवन
का विनाश, चोरी, व्यभिचार और असत्य से क्षति नहीं पहुँचती है? क्या व्यक्तिगत
पवित्रता के लिये यह आवश्यक नहीं है कि चरित्र की पर्याप्त शक्ति अर्जित कर
ली जाये, जिससे कि इन बुराइयों को नियन्त्रण में रखा जा सके? किस प्रकार
एक व्यक्ति भलाई का साधन बन सकता है, यदि उसमें व्यक्तिगत पवित्रता
नहीं है?’’ और उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘जैसा आपने कहा यह ऐसा ही है।’’
- ‘‘क्यों व्यक्ति दूसरों को दास बनाना या उन पर शासन करना बुरा नहीं मानते हैं?
क्योंकि व्यक्ति दूसरों के जीवन को दुखी बनाना बुरा नहीं मानते हैं? क्या यह
इसलिये नहीं है क्योंकि व्यक्ति एक दूसरे के प्रति अपने आचरण में सदाचारी
नहीं है?’’ और उन्होंने ‘हाँ’ कहा।
- ‘‘तो क्या अष्टांग मार्ग, सम्यक्-दृष्टि, सम्यक्-संकल्प, सम्यक्-वाचा,
सम्यक्-आजीविका, सम्यक्-कर्मान्त, सम्यक्-व्यायाम, सम्यक्-स्मृति और
सम्यक्-समाधि के मार्ग का, संक्षेप में, सद्धर्म के मार्ग पर अनुसरण यदि प्रत्येक
व्यक्ति द्वारा किया जाये, तो सभी अन्याय और अमानवता का अन्त कर देगा,
जो एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के साथ करता है?’’ और उन्होंने कहा, ‘‘हाँ।’’