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- ‘‘शील के मार्ग का विचार करते हुए, उन्होंने पूछा, ‘‘क्या दान दरिद्रों और
गरीबों के कष्टों के निवारण और सामान्य भलाई को प्रोत्साहित करने के लिये
आवश्यक नहीं है? क्या करुणा को दरिद्रता और दुःखों से राहत पहुँचाने के
लिये, जहाँ कहीं भी ये विद्यमान हैं, उत्पन्न करने की आवश्यकता नहीं है?
क्या ‘नैष्क्रम्य’ निस्वार्थ कार्य के लिये आवश्यक नहीं है? क्या ‘उपेक्षा’ सतत्
प्रयास के लिये भले ही कोई व्यक्तिगत लाभ न हो आवश्यक नहीं है?’’
‘‘क्या प्रेम मनुष्य के लिए आवश्यक नहीं है?’’ और उन्होंने कहा, ‘‘हाँ।’’
‘‘मैं एक कदम और आगे बढ़ कर कहता हूँ, ‘‘प्रेम पर्याप्त नहीं है, जिसकी
आवश्यकता है वह है मैत्री।’ यह प्रेम की अपेक्षा व्यापक है। इसका अर्थ न
केवल मनुष्यों के साथ, बल्कि सभी सजीव प्राणियों के साथ मैत्री-भाव है।
यह मनुष्यों तक ही सीमित नहीं है। क्या ऐसी मैत्री आवश्यक नहीं है? इसके
अतिरिक्त ऐसा क्या है, जो सभी सजीव प्राणियों को वही सुख दे सकता है,
जो कोई व्यक्ति स्वयं अपने लिये पाने का प्रयास करता है, चित्त को पक्षपात
रहित रखने के लिये, सभी के लिये खुला, सभी के प्रति स्नेह और किसी के
भी प्रति घृणा से रहित।’’
उन सभी ने कहा, ‘‘हाँ।’’
‘‘इन सद्गुणों के आचरण के साथ, किसी भी प्रकार से प्रज्ञा, अर्थात् निर्मल
बुद्धि अवश्य जुड़ी रहनी चाहिये।’’
- ‘‘क्या प्रज्ञा आवश्यक नहीं है?’’ परिव्राजकों ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्हें
अपने प्रश्न का उत्तर देने के लिये बाध्य करने के लिये बुद्ध ने अपना कथन
जारी रखा कि ‘‘एक भले मनुष्य के गुण हैं ‘कोई बुरा कार्य न करें, ऐसा कुछ
न सोचे जो बुरा है, अपना जीविकोपार्जन किसी बुरे तरीके से न करे और ऐसा
कुछ न बोले जो बुरा है या जिससे किसी अन्य को कष्ट पहुँचे।’’ और उन्होंने
कहा, ‘‘हाँ, यह ऐसा ही है।’’
- ‘‘किन्तु क्या आँख बन्द किये हुए सत्कर्म किये जाने का स्वागत किया जाना
चाहिये?’’ बुद्ध ने पूछा, ‘‘मैं कहता हूँ, ‘नहीं।’ यह पर्याप्त नहीं है’, बुद्ध ने
परिव्राजकों से कहा, ‘‘यदि यह पर्याप्त होता, ‘‘तो एक छोटे बच्चे के लिये
घोषित किया जा सकता कि वह सदैव भलाई कर रहा है। क्यों अभी तक,
बच्चा यह नहीं जानता कि एक शरीर का अर्थ क्या है, वह अपने शरीर के
द्वारा लात चलाने से अधिक क्या बुरा कार्य कर सकता है, वह नहीं जानता कि