6. बुद्ध का पहला प्रवचन (जारी) - Page 147

118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

वाणी क्या है? वे रोने से अधिक क्या बुरी बात कह सकता है, वह नहीं जानता

है कि विचार क्या है? प्रसन्नता के साथ रोने से अधिक, वह नहीं जानता कि

जीविकोपार्जन क्या है? वह अपनी माँ का दूध पीने से अधिक एक बुरे तरीके

से अपनी जीविका क्या कमा सकता है।’’

  1. ‘‘अतः शील के मार्ग का अवश्य ही प्रज्ञा के द्वारा परीक्षण किया जाना चाहिये,

जो विवेक और बुद्धि का दूसरा नाम है।’’

  1. ‘‘एक और भी कारण है कि क्यों प्रज्ञा पारमिता इतनी महत्वपूर्ण और इतनी

आवश्यक है। दान अवश्य होना चाहिये, किन्तु प्रज्ञा के बिना, दान का उत्साहभंग

करने वाला प्रभाव हो सकता है। करुणा अवश्य होनी चाहिये। किन्तु प्रज्ञा के

बिना, करुणा का अंत बुराई के समर्थन में हो सकता है। पारमिता के प्रत्येक

कार्य प्रज्ञा पारमिता जो विवेक का दूसरा नाम है की कसौटी पर खरे उतरने

चाहिएं।’’

  1. ‘‘मैं आधार-वाक्य के रूप में कहता हूँ कि ज्ञान और चेतना अवश्य होनी

चाहिये कि अकुशल कर्म क्या है, यह कैसे उत्पन्न होता है, इसी प्रकार ज्ञान

और चेतना भी अवश्य होनी चाहिये कि कुशल कर्म और अकुशल कर्म क्या

है। ऐसे ज्ञान के बिना यथार्थ भलाई नहीं हो सकती भले ही कर्म अच्छे रहे

हों। इसीलिये मैं कहता हूँ कि प्रज्ञा एक आवश्यक सद्गुण है।’’

  1. तब बुद्ध ने परिव्राजकों को निम्नलिखित प्रेरणा देते हुए अपना उपदेश समाप्त

किया-

  1. ‘‘बहुत संभव है कि तुम लोग मेरे धर्म को निराशावादी कहो, क्योंकि यह

मानव-जाति का ध्यान दुख के अस्तित्व की ओर आकर्षित करता है। मैं तुम

लोगों को कहता हूँ मेरे धर्म के प्रति ऐसा धारणा गलत होगी।’’

  1. ‘‘निस्सन्देह, मेरा धर्म दुख के अस्तित्व को स्वीकार करता है, किन्तु यह मत

भूलो कि यह उतना ही बल दुख के निवारण पर भी देता है।’’

  1. ‘‘मेरे धर्म के भीतर आशा और उद्देश्य दोनों समाहित हैं।’’

  2. ‘‘इसका उद्देश्य ‘अविद्या’ का नाश करना है, को हटाना है, जिससे मेरा अभिप्राय

दुख के अस्तित्व को अज्ञान से है।’’

  1. ‘‘इसमें आशा भी है, क्योंकि यह मनुष्य के दुःखों का अन्त करने का मार्ग

दर्शाता है।’’