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- ‘‘क्या तुम लोग इससे सहमत हो या नहीं?’’ और परिव्राजकों ने कहा, ‘‘हाँ,
हम सहमत हैं।’’
7. परिव्राजकों की प्रतिक्रिया
- पाँचों परिव्राजकों ने तुरन्त अनुभव किया कि यह यथार्थ में एक नया धर्म है।
वे जीवन की समस्याओं के प्रति इस नये दृष्टिकोण से इतने अधिक प्रभावित
हुए कि वे यह कहने में एकमत थे कि ‘‘संसार के इतिहास में कभी भी धर्म
के किसी संस्थापक ने यह शिक्षा नहीं दी कि मानव दुःखों की मान्यता ही धर्म
का वास्तविक आधार है।’’
- ‘‘संसार के इतिहास में कभी भी धर्म के संस्थापक ने यह शिक्षा नहीं दी कि
इस कष्ट का निवारण ही इसका वास्तविक उद्देश्य है।’’
- ‘‘संसार के इतिहास में कभी भी मुक्ति का एक ऐसा मार्ग नहीं सुझाया गया, जो
अपनी प्रकृति में इतना सरल हो, जो अलौकिक और अति मानवीय शक्तियों से
इतना मुक्त हो, जो आत्मा में विश्वास से, ईश्वर में विश्वास से और मृत्यु के पश्चात्
जीवन में विश्वास से इतनी स्वतंत्रता और यहाँ तक कि इतना प्रतिकूल हो।’’
- ‘‘संसार के इतिहास में पहले कभी भी ऐसे धर्म की स्थापना नहीं की गयी,
जिसका रहस्योद्घाटन ईश्वर-वचन से कुछ भी लेना-देना न था और जिसकी
आज्ञायें मनुष्य की सामाजिक आवश्यकताओं के परीक्षण से उत्पन्न हुई हैं और
जो ईश्वर की आज्ञायें नहीं हैं।’’
- ‘‘संसार के इतिहास में कभी भी मुक्ति को सुख के वरदान के रूप में नहीं
समझा गया है, जिसे मनुष्य द्वारा इस जीवन में और इसी पृथ्वी पर स्वयं अपने
प्रयासों द्वारा उत्पन्न सद्गुणों से प्राप्त किया जा सकता है।’’
- ये वे भावनायें थी, जिन्हें परिव्राजकों ने अपने नये धर्म पर बुद्ध के उपदेश सुनने
के बाद व्यक्त किया था।
- उन्होंने अनुभव किया कि बुद्ध में उन्होंने ऐसे सुधारक को पा लिया था, जो
सबसे गम्भीर नैतिक उद्देश्य से परिपूर्ण और अपने समय की सभी बौद्धिक
संस्कृतियों में प्रशिक्षित था, जिसमें मौलिकता और विरोधी विचारों के ज्ञान के
साथ जानबूझकर एक ऐसी मुक्ति के सिद्धान्त को सुझाने का साहस था, जिसे
इसी जीवन में मनो-साधना और मन का-संयम के अभ्यास द्वारा प्राप्त अन्तर्मुखी
हृदय के परिवर्तन द्वारा पाया जा सकता है।