124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
उसका पता-ठिकाना जानने के पश्चात् भगवान बुद्ध उरुवेल के पास गये।
तथागत उससे मिले और उसे शिक्षित करने एवं दीक्षित करने का एक योग्य
अवसर चाहते हुए बोले, ‘‘यदि यह तुम्हें अरुचिकर न हो तो, काश्यप! मुझे
एक रात अपने आश्रम में रहने दो।’’
- ‘‘मैं इससे सहमत नहीं हूँ’’, काश्यप ने कहा। ‘‘मुचलिन्द नामक एक जंगली
नागराज है, जो इस स्थान पर शासन करता है। वह भयानक शक्तियों का स्वामी
है। वह अग्नि-पूजा अनुष्ठान करने वाले सभी तपस्वियों का भयंकर शत्रु है।
वह रात में उनके आश्रमों में आता है और उन्हें बड़ी हानि पहुँचाता है। मुझे
भय है कि वह तुम्हें भी वही हानि पहुँचायेगा, जैसी वह मुझे पहुँचाता है।’’
- काश्यप नहीं जानता था कि नाग लोग तथागत के मित्र और अनुयायी बन चुके
थे। किन्तु तथागत यह जानते थे।
- अतः तथागत ने अपने आग्रह पर जोर देते हुए कहा, ‘‘बहुत सम्भव है कि वह
मुझे कोई हानि नहीं पहुँचायेगा। कृपया, काश्यप! मुझे एक रात के लिये अपनी
अग्निशाला में एक स्थल की अनुमति दे दो।’’
- काश्यप अनेक कठिनाइयों का वर्णन करता रहा और तथागत अपने आग्रह पर
जोर देते रहे।
- तब काश्यप ने कहा, ‘‘मेरा चित्त कोई विवाद नहीं चाहता। केवल मेरे पास मेरे
भय और आशंकायें हैं, किंतु जैसा आपको अच्छा लगे वैसा करें।’’
- तथागत ने तत्काल अग्निशाला में प्रवेश किया और अपना आसन ग्रहण
किया।
- नागराजा मुचलिन्द अपने सामान्य समय पर कक्ष में आया, किन्तु काश्यप को
पाने के बदले उसने तथागत को उसके स्थान पर बैठे पाया।
- मुचलिन्द ने भगवान को बैठे देखा, उनके मुख को शान्ति और गम्भीरता से
देदीप्यमान होता पा, ऐसा अनुभव किया जैसे वह एक महान दिव्य पुरुष के
समक्ष है, और अपने सिर को झुकाते हुए तथागत की पूजा करनी प्रारम्भ कर
दी।
- उस रात काश्यप की नींद इस विचार से कि उसके अतिथि के साथ क्या घटित
हुआ होगा, अत्यधिक बाधित रही थी। अतः वह अनेक आशंकाओं के साथ
सुबह उठा इस बात से डरते हुए कि उसका अतिथि सम्भवतः जला ही दिया
गया हो।