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- तब काश्यप और उसके अनुयायी सुबह की रोशनी में एक साथ देखने के लिये
गये। भगवान को मुचलिन्द द्वारा हानि पहुँचाते हुए देखने की बात तो दूर, उन्होंने
मुचलिन्द को भगवान की पूजा करते हुए पाया।
- यह दृश्य देखते हुए, काश्यप ने महसूस किया कि वह एक महान चमत्कार
(प्रातिहार्य) देख रहा है।
- इस चमत्कार से प्रभावित काश्यप ने तथागत से उसके समीप ही ठहरने का
आग्रह किया और उनकी देखभाल करने का वचन दिया।
तथागत ठहरने को सहमत हो गये।
दोनों के भिन्न उद्देश्य थे। काश्यप का उद्देश्य मुचलिन्द नाग के विरुद्ध संरक्षण
प्राप्त करना था। भगवान बुद्ध ने सोचा कि एक दिन काश्यप उन्हें अपने धर्म
को प्रस्तुत करने का अवसर देगा।
- किन्तु काश्यप ने ऐसी कोई रुचि नहीं दिखलायी। उसने सोचा कि भगवान बुद्ध
केवल एक चमत्कार करने वाले है और उससे ज्यादा और कुछ नहीं।
- एक दिन भगवान बुद्ध ने स्वयं ही पहल करने की सोची और ‘काश्यप से
पूछा, ‘‘क्या तुम एक अर्हत हो?’’
- ‘‘यदि तुम एक अर्हत नहीं हो, तो यह अग्नि-होत्र तुम्हारा क्या कल्याण करने
वाला है?’’
- काश्यप ने कहाः ‘‘मैं नहीं जानता हूँ कि एक अर्हत होना क्या होता है? क्या
आप स्पष्ट करेंगे?’’
- तब भगवान ने काश्यप से कहा, ‘‘एक अर्हत वह व्यक्ति है, जिसने उन सभी
मनोविकारों को विजित कर लिया है वह अर्हत है। अग्निहोत्र एक व्यक्ति का
उसके पापों से परिमार्जन नहीं कर सकता।’’
- काश्यप अभिमानी व्यक्ति था। किन्तु उसने भगवान बुद्ध के तर्क की शक्ति को
अनुभव किया। अपने चित्त को नमनशील और सुनम्य बना कर यहाँ तक कि
अन्ततोगत्वा उसे सद्धर्म का वाहक बनने योग्य तैयार कर, उसने स्वीकार किया
कि उसकी दरिद्र बुद्धि की तुलना विश्व-सम्मानित बुद्ध की बुद्धि से नहीं की
जा सकती।
- और इस प्रकार, आखिरकार कायल होकर, विनम्रतापूर्वक निवेदन करते हुए, उरुवेल
काश्यप ने भगवान के धर्म को स्वीकार कर लिया उनका शिष्य बन गया।