3. सारिपुत्र और मौग्गल्लान का धर्मांतरण - Page 156

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उससे तृष्णा का क्षय हो जाता है, तृष्णा के समाप्त होते ही व्यक्ति श्र्रमण बन

जाता है।’’

  1. उन महान ऋषियों ने उनको सुन कर, अग्नि-पूजा के प्रति उन्हें सर्वदा के लिए

उपेक्षा हो गई और बुद्ध के शिष्य बनने की इच्छा व्यक्त की।

  1. काश्यपों का धर्मांतरण भगवान बुद्ध के लिये एक महान् विजय थी, क्योंकि

लोगों के मन पर उनका अत्यधिक प्रभाव था।

3. सारिपुत्र और मौद्गल्यापन की धर्म-दीक्षा

  1. जब भगवान बुद्ध राजगृह में थे, तो वहाँ संजय नामक एक प्रसिद्ध व्यक्ति

परिव्राजकों के एक विशाल समूह के साथ रहता था, जिनकी संख्या दो सौ

पचास थी। वे उसके शिष्यों के रूप में रहते थे।

  1. उसके शिष्यों में दो ब्राह्मण युवक-सारिपुत्र और मौद्गल्यापन थे।

  2. सारिपुत्र और मौद्गल्यापन संजय की शिक्षाओं से संतुष्ट नहीं थे और किसी

बेहतर (धर्म) की तलाश में थे।

  1. एक दिन की बात है कि पंचवर्गीय भिक्षुओं में से अश्वजित् नामक एक भिक्षु

पूर्वाह्न की बात है अपने भिक्षापात्र लेकर और चीवर पहन भिक्षा के लिये

राजगृह के नगर में प्रवेश किया।

  1. सारिपुत्र अश्वजीत् के ओजस्वी आचरण का अवलोकन कर रहे थे और उससे प्रभावित

हुए थे। भिक्षु अश्वजीत् को देखकर, सारिपुत्र ने सोचा, ‘‘निःसंदेह यह व्यक्ति उन

भिक्षुओं में से एक है, जो संसार में यशस्वी व्यक्ति हैं। यह कैसा हो, यदि मैं इस

भिक्षु के समीप जाऊँ और उनसे पूछूँ ‘‘किसके नाम से, मित्र! तुम ने संसार का

त्याग किया है? तुम्हारा गुरु कौन है? तुम किसके धर्म को मानते हो?’’

  1. इस समय सारिपुत्र ने सोचा, ‘‘इस भिक्षु से कुछ पूछने का यह उचित समय

नहीं है, वे भिक्षा के लिये एक घर के भीतरी आँगन में प्रवेश कर चुके हैं।

यह कैसा हो, यदि मैं इस भिक्षु का उस मार्ग के अनुसार धीरे-धीरे पीछा करूँ,

जिसे उन लोगों ने मान्यता प्रदान की है, जो कुछ पाना चाहते हैं?’’

  1. भिक्षु अश्वजीत्, राजगृह में अपना भिक्षाटन समाप्त कर चुकने के पश्चात् प्राप्त

भोजन सहित वापस लौट गये। तब सारिपुत्र उस स्थल पर गये, जहाँ भिक्षु

अश्वजीत् थे, उनके समीप जाकर, उन्होंने अभिवादन किया और कुशल-क्षेम

पूछकर वे उनकी बगल में खड़े हो गये।