3. सारिपुत्र और मौग्गल्लान का धर्मांतरण - Page 157

128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. उनकी बगल में खड़े हुए परिव्राजक सारिपुत्र ने भिक्षु अश्वजीत् से कहा,

‘‘मित्र! आपका मुख-मण्डल, शान्त है_ आपका स्वरूप पवित्र एवं उज्ज्वल है।

किसके नाम पर, मित्र! तुमने संसार का त्याग किया है? तुम्हारा गुरु कौन है?

तुम किसके धर्म को मानते हो?’’

  1. अश्वजीत् ने उत्तर दिया, ‘‘मित्र! शाक्य-कुल के एक महान् श्रमण है, इन

तथागत के नाम पर, मैंने संसार का त्याग किया है, यही तथागत मेरे गुरु हैं

और इन्हीं तथागत का यहा धर्म है, जिसका मैं अनुसरण करता हूँ।’’

  1. ‘‘और आदरणीय भिक्षु! धर्म क्या है जिसे आपके गुरु मानते हैं? और वह तुम्हें

क्या उपदेश देते हैं?’’

  1. ‘‘मित्र!’ मैं एक नया शिष्य हूँ, मित्र! मैंने अभी कुछ ही समय पहले प्रव्रज्या ग्रहण

की है और मैंने हाल में इस धर्म और विनय को अपनाया है। मैं विस्तारपूर्वक

आपको धर्म की व्याख्या नहीं कर सकता हूँ, किन्तु मैं संक्षेप में आपको बताऊँगा

कि इसका अभिप्राय क्या है?’’

  1. तब परिव्राजक सारिपुत्र ने भिक्षु अश्वजीत् से कहा, ‘‘मित्र! ऐसा ही सही, जैसा

आप चाहें कितना भी अधिक या कितना भी कम मुझे बतायें, किन्तु मुझे उसका

सार बतायें, मैं केवल सार जानना चाहता हूँ। बहुत ही अधिक शब्दों की क्या

आवश्यकता है?’’

  1. तब भिक्षु अश्वजीत् ने बुद्ध की शिक्षाओं का सार सारिपुत्र को स्पष्ट किया और

सारिपुत्र पूर्णतया संतुष्ट हो गया था।

  1. सारिपुत्र और मौद्गल्यापन, यद्यपि भाई-भाई नहीं थे, लेकिन वे दोनों भाइयों के

समान रहते थे इस प्रकार परस्पर, उन्होंने एक-दूसरे को वचन दे रखा था कि

जो पहले सत्य को प्राप्त करता है, वह दूसरे को भी उसके विषय में बतालाएगा।

यह उनकी परस्पर वचनबद्धता थी।

  1. तदनुसार सारिपुत्र उस स्थान पर गये, जहाँ मौद्गल्यापन थे। उन्हें देखकर,

मौद्गल्यापन ने सारिपुत्र से कहा, ‘‘मित्र! तुम्हारी मुखाकृति, शान्त है_ तुम्हारी

छवि पवित्र और उज्ज्वल है। तब क्या तुम वास्तव में सत्य तक पहुँच चुके

हो?’’

  1. ‘‘हाँ, मित्र! मैंने सत्य को जान लिया है।’’ और ‘‘कैसे मित्र! तुमने ऐसा क्या

किया है?’’ तब सारिपुत्र ने उनको वह सब बताया, जो उनके और अश्वजीत्

के मध्य घटित हुआ था।