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- तब मौद्गल्यापन ने सारिपुत्र से कहा, ‘‘आओ मित्र! हम चलें, मित्र, और तथागत
से मिलें_ जिससे कि वे, तथागत, हमारे रास्ता बनें।’’
- सारिपुत्र ने उत्तर दिया, ‘‘मित्र! हम लोगों के कारण ही, ये दो सौ पचास
परिव्राजक यहाँ रहते हैं, और वे हम लोगों का ही सम्मान करते हैं, आओ
हम छोड़ कर जाने से पहले उन्हें सूचित कर दें, वे जैसा उचित समझेंगे वैसा
करेंगे।’’
- तब सारिपुत्र और मौद्ल्यापन उस स्थान पर गये जहाँ वे लोग थे, उनके निकट
जाकर उन्होंने उनसे कहा, ‘‘मित्रों! हम तथागत की शरण ग्रहण करने जा रहे
हैं, वे तथागत, हमारे शास्ता (गुरु) हैं।’’
- उन लोगों ने उत्तर दिया, ‘‘आप लोगों के कारण ही, हम यहाँ रहते हैं, और हम
आपको ही मानते रहे हैं, यदि आप लोग, महाश्रमण के अधीन पवित्र जीवन
व्यतीत करेंगे, तो हम सब भी यही करेंगे।’’
- तब सारिपुत्र और मौद्ग्ल्यापन उस जगह पर गये जहाँ संजय थे, उनके निकट
जा कर, उन्होंने कहा, ‘‘मित्र! हम तथागत की शरण ग्रहण करने जा रहे हैं,
वह हमारे शास्ता हैं।’’
- संजय ने उत्तर दिया, ‘‘नहीं, मित्रो! मत जाइये, हम तीनों मिल कर इन सबकी
देखभाल करेंगे।’’
- और दूसरी तथा तीसरी बार भी सारिपुत्र और मौद्गल्यापन ने यही बात कही
और संजय ने पहले के समान उत्तर दिया।
- तब सरिपुत्र और मौद्गल्यापन ने अपने साथ दो सौ पचास परिव्राजकों को लेकर
राजगृह में वेलुवन को गये, जहाँ तथागत विराजवान थे।
- तथागत ने उन्हें देखा, सारिपुत्र और मौद्गल्यापन, दूर से आ रहे थे, उन लोगों
को देखकर उन्होंने भिक्षुओं को इस प्रकार सम्बोधित किया, ‘‘भिक्षुओं! ये दो
साथी आ रहे हैं,’’ सारिपुत्र और मौद्गल्यापन की ओर इशारा करते हुए, ‘‘ये
मेरे प्रमुख श्रावक-युगल, और शुभ-युगल होंगे।’’
- जब वे वेलुवन में आ चुके थे, तब उस स्थान पर गये जहाँ तथागत थे, उनके
निकट आकर, उन्होंने तथागत के चरणों में अपने शीश नवाकर साष्टांग प्रणाम किया
और तथागत से बोले, ‘‘हमें तथागत द्वारा प्रव्रज्या और उपसम्पदा मिले।’’ 27. तब तथागत ने प्रव्रज्या को निर्दिष्ट करने वाले समान्य सूत्र का उच्चारण किया,
‘‘ऐहि भिक्खु’’ (आओ भिक्षुओ!) और फिर सारिपुत्र तथा मौद्गल्यापन और
दो सौ पचास अन्य जटिल बुद्ध के शिष्य बन गये।