130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
4. राजा बिम्बिसार की धम्म-दीक्षा
राजगृह मगध-नरेश श्रेणिक बिम्बिसार की राजधानी थी।
जटिलों की इतनी बड़ी संख्या का बुद्ध की शरण में चले जाने की चर्चा पूरे
नगर में थी।
- इस प्रकार राजा बिम्बिसार को तथागत के नगर में आगमन के विषय में ज्ञात
हो गया था।
- राजा ने सोचा, ‘‘सबसे अधिक रूढि़वादी और कट्टर जटिलों का धर्मांतरण
कराना कोई मामूली बात नहीं है। ‘‘वास्तव में ऐसा ही है,’’ राजा बिम्बिसार ने
स्वयं से कहा, ‘‘वह अवश्य ही भगवान अर्हत होंगे, सम्यक् सम्बुद्ध, ज्ञान और
आचरण में निपुण, पथ-प्रदर्शक, लोक के जानकर, सर्वश्रेष्ठ होंगे, मनुष्यों के
मार्ग-दर्शक और देवताओं तथा मनुष्यों के शास्ता होंगे। वह अवश्य ही सत्य
की शिक्षा दे रहे होंगे, जिसे उन्होंने स्वयं समझ लिया है।’’
- ‘‘वह अवश्य ही ऐसे धर्म का उपदेश दे रहे होंगे, जो आदि में कल्याण कारक,
मध्य में कल्याणकारक और अन्त में कल्याणकारक है तथा अर्थ एवं शब्द सहित
उसका ज्ञान करा रहे होंगे, वह अवश्य ही परिपूर्ण, शुद्ध एवं पवित्र जीवन की
उद्घोषणा कर रहे होंगे। उनके जैसे दिव्य पुरुष का दर्शन प्राप्त करना उत्तम
है।’’
- अतः राजा बिम्बिसार, मगध के बारह लाख ब्राह्मणों और गृहस्थों से घिरे
उस स्थल पर गये जहाँ तथागत विराजवान थे। उनके समीप पहुँचकर और
विनम्रतापूर्वक अभिवादन करके, वह उनके समीप बैठ गए और उन बारह लाख
मगध के ब्राह्मणों और गृहस्थों में से, कुछ ने भी विनम्रतापूर्वक अभिवादन किया
और उनके समीप बैठ गये, कुछ ने तथागत का कुशल-क्षेम पूछा, और इसके
उपरान्त सुनम्य शब्दों के साथ वे उनके समीप बैठ गये, कुछ ने तथागत को
कर-कमलों से प्रणाम किया और उनके समीप बैठ गये, कुछ ने तथागत के
समक्ष अपना नाम और गोत्र बताया और उनके समीप बैठ गये, कुछ निःशब्द
उनके समीप बैठ गये।
- अब उन बारह लाख मगध के ब्राह्मणों और गृहस्थों ने भगवान बुद्ध के साथ
आये भिक्षुओं के मध्य उरुवेल काश्यप को देखा। उन्होंने सोचा ‘‘अब यह
क्या हैं? क्या उरुवेल काश्यप महाश्रमण की अधीनता में श्रेष्ठ जीवन व्यतीत
कर रहा है अथवा महाश्रमण ही उरुवेल काश्यप की अधीनता में श्रेष्ठ जीवन
व्यतीत कर रहा है, के अधीन पवित्र जीवन व्यतीत कर रहे हैं?’’