131
- और तथागत, अपने मन में उस विचार को जान चुके थे, जो उन बारह लाख
मगध के ब्राह्मणों और गृहस्थों के मन में उठ रहा था, तब भगवान ने भिक्षु
उरुवेल काश्यप से कहा, ‘‘तुमने क्या देखा, ओ उरुवेलवासी! कि तुम जो महान्
कहे जाते थे, ने अग्नि-पूजा का परित्याग कर दिया? यह कैसे हुआ कि तुमने
अग्निहोत्र का परित्याग कर दिया?’’
- काश्यप ने उत्तर दिया, ‘‘यज्ञों से रूप, शब्द, रस तथा स्त्री-स्पर्श की ही आशा
की जा सकती है। क्योंकि मैंने जान लिया है कि मैं वासनामय रूप, रस, शब्द,
गंध और स्पर्श अपवित्र है अतः मुझे यज्ञों और आहूतियों में अब आनन्द की
प्राप्ति नहीं होती।’’
- ‘‘किन्तु यदि आपको बुरा न लगे, तो हमें बतायें कि किसने तुम्हें ऐसा सोचने
को प्रेरित किया?’’
- तब भिक्षु उरुवेल काश्यप अपने आसन से उठे, अपने चीवर को ठीक किया,
जिससे एक कंधा ढँक जाये, तथागत के चरणों पर अपने सिर को झुकाते हुए
साष्टांग प्रणाम किया, और तथागत से बोले, ‘मेरे गुरु तथागत हैं, मैं उनका
शिष्य हूँ। तब वे बारह लाख मगध के ब्राह्मण और गृहस्थ समझ गये, ‘‘उरुवेल
काश्यप महाश्रमण के अधीन पवित्र जीवन का पालन कर रहे हैं।’’
- जब तथागत ने, जो अपने मन में उस विचार को जान चुके थे, जो उन बारह
लाख मगध के ब्राह्मणों और गृहस्थों के मन में उठ रहा था, उन्हें अपने धम्म का
उपदेश दिया। जिस प्रकार काले धब्बों से रहित एक स्वच्छ कपड़ा अच्छी तरह
रंग पकड़ लेता है, उसी प्रकार बिम्बिसार ने उन ग्यारह लाख मगध के ब्राह्मणों
और गृहस्थों के उनके प्रमुख के रूप में वहीं बैठे हुए ही, धम्म के पवित्र
और दागरहित रंग को प्राप्त कर लिया। शेष एक लाख से अपने उपासकत्व
की घोषणा कर दी।
- अब मगध के राजा, सेणिय बिम्बिसार ने, इस दृश्य का साक्षी होकर धम्म को
समझ कर, धम्म में प्रवेश कर, अनिश्चय को विजित कर सभी सन्देहों को दूर
कर, सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर, तथागत से कहाः भगवन! पूर्व दिनों में, जब मैं
एक राजकुमार था, पाँच आकांक्षायें मेरे मन में थीं, वे अब पूर्ण हो गई हैं।’’
- ‘‘भगवन्! पिछले दिनों में, जब मैं एक राजकुमार था, मेरे मन में यह विचार
आया काश! मैं एक राज्याभिषेकित राजा बन जाऊँ!’’ वह मेरी पहली आकांक्षा
थी, जो अब पूर्ण हो गयी है। तब एक दिव्यात्मा, एक सम्यक्, मेरे राज्य में
पधारें! यह मेरी दूसरी आकांक्षा थी, भगवन् जो अब पूर्ण हो गयी है। और मैं