5. अनाथ पिण्डिक का धर्मांतरण - Page 161

132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

उन तथागत की सेवा में उपस्थित होऊँ!’ वह मेरी तीसरी आकांक्षा थी, जो अब

पूर्ण हो गयी है। ‘और वह, तथागत, मुझे धम्म का उपदेश दे!’ यह मेरी चौथी

आकांक्षा थी, भगवन्! और वह अब पूर्ण हो गयी है। ‘और मैं उन तथागत के

धम्म को समझ सकूँ!’ यह मेरी पाँचवीं आकांक्षा थी, भगवन्! यह अब पूर्ण

हो गयी है। भगवन्! ये मेरी पाँच आकाँक्षायें थीं, जिन्हें मैं पूर्व दिनों में जब मैं

एक राजकुमार था। अपने मन में लाया था।’’

  1. ‘‘अद्भुत, भगवन्! अद्भुत, जिस प्रकार कोई उसे सीधा कर दे, जो औंधा किया

हुआ था, या उसे प्रकट कर दे, जो छुपा हुआ था या उसको मार्ग दिखला

दे, जो अपने मार्ग से भटका हुआ था, या अन्धकार में एक दीपक जला दे,

इसलिए कि जिनके आँखें हैं वे वस्तुओं को देख सकें, उसी प्रकार तथागत ने

विभिन्न प्रकार से धम्म का उपदेश दिया। भगवन्! मैं तथागत की, धम्म की,

और भिक्षुओं के संघ की शरण ग्रहण करता हूँ। आज के दिन से आगे तक,

जब तक मेरा जीवन है भगवन्! मुझे एक उपासक मानें, जिसने उनकी शरण

ग्रहण की है।’’

5. अनाथपिण्डिक की धम्म-दीक्षा

  1. सुदत्त कोशल राज्य की राजधानी श्रावस्ती का एक नागरिक था। कोसल जनपद

इस पर प्रसेनजित शासन करता था। सुदत्त राजा का खजान्ची (श्रेष्ठी) था।

गरीबों को बहुत दान देने के कारण, सुदत्त अनाथपिण्डिक के नाम से जाना

जाता था।

  1. जब भगवान राजगृह में थे, अनाथपिण्डिक अपने किसी निजी कार्य से राजगृह

आया हुआ था। वह अपनी बहन के यहाँ ठहरा हुआ था, जिसका विवाह राजगृह

के श्रेष्ठी-प्रमुख के साथ हुआ था।

  1. जब वह वहाँ पहुँचा, तो उसने पाया कि श्रेष्ठी प्रमुख भगवान और उनके भिक्षुओं

के लिये भोजन इतने बड़े पैमाने पर तैयार करा रहा था कि उसने सोचा कोई

विवाह हो रहा है या राजा को निमन्त्रण दिया गया है।

  1. जब उसे सत्य बात की जानकारी प्राप्त हुई, तो वह भगवान के पास जाने को

अत्यन्त उत्सुक हो गया और वह उसी रात तथागत से मिलने के लिये चल

पड़ा।

  1. और तथागत ने अनाथपिण्डिक के हृदय के उत्कृष्ट गुण को तुरंत देख लिया

और सान्त्वना के शब्दों द्वारा उसका स्वागत किया। अपना आसन ग्रहण करने