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के बाद अनाथपिण्डिक ने किसी धार्मिक विषय पर उपदेश सुनने की इच्छा
व्यक्त की।
- तथागत ने उसकी इच्छा के प्रत्युत्तर में एक प्रश्न पूछा, ‘‘वह कौन है जो हमारे
जीवन को आकार देता है? क्या वह ईश्वर, एक व्यक्तिगत निर्माता है? यदि
ईश्वर सृष्टिकर्ता है, सभी सजीव प्राणियों को चुपचाप उनके सृष्टिकर्ता की
शक्ति के अधीन ही होना चाहिये। वे कुम्हार के हाथों बनाये हुए बर्तनों की
तरह होंगे। यदि विश्व ईश्वर द्वारा निर्मित होता तो दुख, या आपत्ति, या पाप
जैसी कोई वस्तु नहीं होनी चाहिये, और वह स्वयंभू भी नहीं होगा। अतः आप
देख सकते हैं, ईश्वर का विचार पराजित हो जाता है।’’
- ‘‘पुनः यह कहा जाता है कि स्वयंभू एक कारण नहीं हो सकता है। हमारे चारों
ओर की वस्तुएँ एक कारण से आती हैं, जैसे पौधा बीज से उत्पन्न होता है,
तो कैसे स्वयंभू सभी वस्तुओं का एक समान कारण हो सकता है? यदि वह
उन सब में व्याप्त है, तब निश्चित ही वह उनका निर्माण नहीं करता है।’’
- ‘‘पुनः यह कहा जाता है कि आत्मा ही निर्माता है। किन्तु यदि आत्मा ही निर्माता
है, तो क्यों वह वस्तुओं को सुखद नहीं बनाता है? दुख और सुख की घटनायें
वास्तविक और यथार्थ है। वे कैसे आत्मा द्वारा निर्मित हो सकती हैं?’’
- ‘‘पुनः यदि तुम यह तर्क अपना लो, कि कोई निर्माता नहीं है, या यह भाग्य
ही है जैसा वह है, और कोई हेतु प्रत्यय नहीं है, जो हमारे जीवन को आकाश
देने और साधनों तथा साध्यों का मेल बिठाने का क्या लाभ होगा?’’
- ‘‘अतः हमारा कहना है कि सभी वस्तुयें जिनका अस्तित्व है, बिना कारण
नहीं है। हालाँकि, न तो ईश्वर, न ही स्वयंभू, न आत्मा, न कारणरहित संयोग,
निर्माता है, बल्कि हमारे कर्म अच्छे और बुरे परिणामों को उत्पन्न करते हैं।’’
- ‘‘सम्पूर्ण संसार प्रतीत्य-समुत्पाद के नियम के अधीन है, और कारण जो कार्य
करते हैं अमानसिक (अचैतसिक) नहीं है, क्योंकि जिस सोने से प्याला निर्मित
है, वह शुरु से अन्त तक सोना ही है।’’
- ‘‘आइए हम, इसलिये, ईश्वर की पूजा करना और उससे प्रार्थना करने की
मिथ्या-धारणाओं का परित्याग करें, आइये हम निरर्थक सूक्ष्मता की व्यर्थ निराधार
कल्पनाओं में स्वयं को नष्ट न करें, आइए हम आत्मा और सभी स्वार्थों का
परित्याग करें, और जैसे सभी वस्तुयें प्रतीत्य समुत्पाद द्वारा निर्धारित हैं, आइये
हम अच्छे कर्म का पालन करें, जिससे कि हमारे कार्यों के अच्छे परिणाम
निकलें।’’