134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- और अनाथपिण्डिक ने कहा, ‘‘तथागत ने जो कुछ कहा मैं उसका सत्य देख
रहा हूँ और मैं अपने सम्पूर्ण मन को खोलना चाहता हूँ। मेरे शब्दों को सुनने
के उपरान्त भगवान मुझे सलाह दें कि मैं क्या करूँ।’’
- ‘‘मेरा जीवन कार्य से परिपूर्ण है, और अत्यन्त सम्पदा ‘अर्जित करने के कारण,
मैं चिन्ताओं से घिरा हुआ हूँ। तथापि मैं अपने कार्य में आनन्द पाता हूँ, और
मैं सम्पूर्ण परिश्रम से स्वयं को इसमें लगाये रखता हूँ। अनेक लोग मेरी नौकरी
में हैं और मेरे उद्यमों की सफलता पर निर्भर करते हैं।’’
- ‘‘अब, मैंने सुना है आपके शिष्य प्रव्रज्ज्या के सुखों की प्रशंसा करते हैं और
विश्व की अशान्ति की भर्त्सना करते हैं। वे कहते हैं, ‘तथागत’, ने अपना
राज्य और अपनी विरासत त्याग दी है, और सधर्म का मार्ग अपना लिया है,
इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व के समक्ष एक उदाहरण रखा है कि निर्वाण कैसे प्राप्त
किया जाये।’’
- ‘‘मेरा हृदय वह करने के लिये जो सही है और अपने साथी-प्राणियों के लिये
एक वरदान साबित होने के लिये लालायित है। मैं तब आप से पूछ सकता हूँ,
क्या मैं अपनी सम्पदा, अपना घर और अपना व्यापार-उद्यम त्याग दूँ, और आपके
समान, गृहत्याग की स्थिति में चला जाऊँ जिससे कि एक धार्मिक जीवन के
सुखों को प्राप्त कर सकूँ।’’
- और तथागत ने उत्तर दियाः ‘‘एक धार्मिक जीवन का सुख उन सभी को प्राप्य
है, जो आर्य आष्टांगिक मार्ग पर चलता है। वह जो सम्पदा से चिपटा रहता है,
बेहतर होगा कि उससे दूर हो जाये, उसके द्वारा अपने हृदय को विषाक्त होने
की अनुमति देने के स्थान पर, किन्तु वह जो सम्पदा से चिपटा नहीं रहता है,
और धन होने पर भी, उसे उचित तरीके से प्रयोग करता है, अपने साथी-प्राणियों
के लिये एक वरदान सिद्ध होगा।’’
- ‘‘मैं तुम्हें यह कहता हूँ कि जीवन में अपने स्थान पर बने रहो और स्वयं को
परिश्रम के साथ अपने उद्यमों में लगाओ। यह न तो जीवन, न सम्पदा और
शक्ति है, जो मनुष्य को दास बनाती है, बल्कि जीवन, सम्पदा और शक्ति के
प्रति लगाव उसे दास बनाता है।’’
- ‘‘भिक्षु जो सुख का जीवन व्यतीत करने के लिये संसार का त्याग करता है
कुछ भी लाभ प्राप्त नहीं कर पायेगा। क्योंकि आलस्य का जीवन एक घृणित
वस्तु है और शक्ति के अभाव की उपेक्षा करनी चाहिये।’’