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- ‘‘तथागत का धम्म एक मनुष्य से गृहत्याग की अवस्था में जाने या संसार का
त्याग करने की अपेक्षा नहीं करता, जब तक कि वह ऐसा करने का अनुभव
नहीं करता है, तथागत का धम्म प्रत्येक मनुष्य से कहता है कि हृदय को निर्मल
करें, काम-भोग की चाह का त्याग करे, और एक सदाचारी जीवन व्यतीत
करें।’’
- ‘‘और मनुष्य जो कुछ भी करे, भले ही वह संसार में एक कलाकार, व्यापारी
या राजा के अधिकारी के रूप में संसार में रहे, या संसार का त्याग कर दे
और स्वयं को धार्मिक ध्यान-भावना के एक जीवन को समर्पित कर दे, उन्हें
अपना सम्पूर्ण हृदय उनके अपने कार्य में लगा देना चाहिये। उन्हें परिश्रमी और
स्फूर्तिवान होना चाहिये, और यदि वे कमल के फूल के समान हैं, जो हालांकि
वह जल में उत्पन्न होता है, तथापि जल द्वारा अछूता रहता है, यदि वे ईर्ष्या
या घृणा को संजोए बिना जीवन में संघर्ष करते हैं, यदि वे संसार में स्वार्थ
का जीवन नहीं, बल्कि सत्य का जीवन व्यतीत करते हैं, तब निश्चय ही हर्ष,
शान्ति और सुख उनके मन में निवास करेंगे।’’
- अनाथपिण्डिक ने समझ लिया कि यह सत्य की, सरल और प्रज्ञा से उत्पन्न
सबसे उत्तम व्यवस्था थी।
- इस प्रकार सद्धर्म पर प्रगाढ़ आस्था होने के उपरान्त वह धीरे-धीरे तथागत के
चरणों पर नतमस्तक हुआ और हाथ जोड़कर निवेदन किया।
6. राजा प्रसेनजित की धम्म-दीक्षा
- यह सुनकर कि भगवान आये हुए हैं, तब राजा प्रसेनजित अपने राजसी रथ पर
जेतवन विहार गये। उन्हें हाथ जोड़कर प्रमाण करके, उन्होंने कहाः
- ‘‘मेरा अयोग्य और अन्धकारमय राज्य धन्य हुआ कि इसकी भेंट इतने महान
सौभाग्य से हुई है, क्योंकि संसार के स्वामी, धम्म-राजा, सत्य के अधिपति की
उपस्थिति में कोई विपत्ति या खतरा इस पर कैसे आ सकता है।’’
- ‘‘अब जबकि मैंने आपके पवित्र स्वरूप के दर्शन कर लिये हैं, मुझे अपनी
शिक्षाओं के अभिनव जल में भागीदार बनने दें।’’
- ‘‘सांसारिक लाभ क्षणिक और नाशवान है, किन्तु धार्मिक लाभ शाश्वत और अनन्त
है। एक सांसारिक मनुष्य, भले ही वह राजा हो, कष्टों से भरा रहता है, किन्तु यहाँ
तक कि एक साधारण मनुष्य जो धर्मपरायण है, के पास मन की शान्ति है।’’