136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- राजा के मन की अवस्था को जानते हुए कि वह धनलोलुपता और सुखों के
प्रति प्रेम से उदास है, तथागत ने अवसर का लाभ उठाया और कहाः
- ‘‘वे लोग भी जिनका जन्म सामान्य-स्थिति में हुआ है, जब किसी धर्मपरायण
मनुष्य को देखते हैं, तो उस मनुष्य के प्रति आदर का अनुभव करते हैं, फिर
एक स्वतन्त्र राजा, जिसने अपने जीवन की पूर्व अवस्थाओं द्वारा बहुत पुण्य
अर्जित किये हुए हैं, कितना अधिक आदर का अनुभव करेगा?’’
- ‘‘और अब वैसा कि मैं संक्षेप में धर्म की व्याख्या करूँगा, महाराज आप मेरे
शब्दों को सुनें और मनन करें, और जो कुछ मैं कहूँ उसे शीघ्रता से हृदयंगम
करें।’’
- ‘‘हमारे अच्छे या बुरे कर्म परछाई के समान लगातार हमारा पीछा करते रहते
हैं।’’
‘‘तो जिस चीज की सर्वाधिक आवश्यकता है वह है मैत्रीपूर्ण-हृदय।’’
‘‘अपनी प्रजा को ऐसे मानें जैसे हम एक इकलौते पुत्र को मानते हैं। उनका
दमन न करें, उन्हें नष्ट न करें, अपने शरीर के सभी अंगों को पूर्ण नियन्त्रण
में रखें, कुमार्ग का परित्याग करें और सीधे मार्ग पर चलें, दूसरों का दमन
करके स्वयं को ऊँचा न उठायें। पीडि़त को सुख पहुँचायें और उसकी सहायता
करें।’’
- ‘‘न तो राजकीय गौरव पर अधिक विचार करें, और न ही चाटुकारों की
चिकनी-चुपड़ी बातों को सुनें।’’
- ‘‘स्वयं को तपश्चर्याओं द्वारा कष्ट देने का कोई लाभ नहीं है, बल्कि धर्म का
ध्यान करें और धर्मपरायण नियमों का मनन करें।’’
- ‘‘हम सभी दिशाओं से शोक और दुःखों की चट्टानों से घिरे हुए हैं और केवल
सद्धर्म का विचार करने से हम इस दुख से परिपूर्ण पर्वत से बचकर निकल
सकते हैं।’’
‘‘तो फिर अन्याय का पालन करने से क्या लाभ है?’’
‘‘वे सभी जो बुद्धिमान हैं शारीरिक सुखों को उपेक्षा करते हैं। वे कामनाओं से
दूर रहते हैं और अपने आध्यात्मिक अस्तित्व के विकास के लिये प्रयत्नशील
रहते हैं।’’
- ‘‘जब एक वृक्ष भीषण लपटों से जल रहा हो, तो कैसे पक्षी उस पर अपने