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घौसले बना सकते हैं? सत्य वहाँ कैसे टिक सकता है जहाँ राग का निवास
है? इसके ज्ञान के बिना, विद्वान मनुष्य, भले ही, वह ऋषि के रूप में उसकी
प्रशंसा होती है, अज्ञानी है।’’
- ‘‘उसी पर जिसके पास यह ज्ञान है प्रज्ञा प्रकट होती है। इस प्रज्ञा की प्राप्ति
ही एक मात्र लक्ष्य है, जिसकी आवश्यकता है। इसकी उपेक्षा करने का अर्थ
जीवन की असफलता है।’’
- ‘‘सभी धार्मिक सम्प्रदायों की शिक्षाओं का यही केन्द्र-बिन्दु होना चाहिये, क्योंकि
इसके बिना सब निरर्थक है।’’
- ‘‘यह सत्य केवल प्रव्रजितों के लिये ही नहीं है, इसका संबंध सभी मनुष्यों से
है, साधु और गृहस्थ दोनों के समान रूप से। भिक्षु जिसने व्रत लिये हैं और
सांसारिक गृहस्थ को अपने परिवार के साथ रहता है, दोनों के मध्य कोई अन्तर
नहीं है। ऐसे भी प्रव्रजित हैं, जो पारीत होकर सर्वनाश को प्राप्त करते हैं और
ऐसे भी विनम्र गृहस्थ है, जो ऋषियों के पद तक उठ जाते हैं।’’
- ‘‘कामाग्नि का ज्वार-भाटा ऐसा खतरा है, जो सभी के लिये समान है_ यह
संसार को बहा ले जाता है। वह जो इसके भंवर में फँस जाता है, वह बच
निकलने का कोई रास्ता नहीं पाता है। लेकिन प्रज्ञा सुलभव नाव है, चिन्तन
पतवार है। धर्म की मांग है, मार-रूपी शत्रु के आक्रमणों से स्वयं को सुरक्षित
रखने का आह्वान करता है।’’
- ‘‘क्योंकि अपने कर्मों के परिणाम से बच निकलना असम्भव है, आइये हम
अच्छे कार्य करें।’’
- ‘‘आइये, हम अपने विचारों का निरीक्षण करें, जिससे कि हम कोई बुरा कार्य
न करें, क्योंकि जैसा हम बोयेंगे, वैसा ही हम काटेंगे।’’
- ‘‘प्रकाश के अन्धकार में और अन्धकार से प्रकाश में जाने के मार्ग हैं। इसी
प्रकार अंधेरे से गहरे अन्धकार में, और भोर के उजाले में चमकते प्रकाश में
जाने के भी तरीके हैं। बुद्धिमान मनुष्य प्रकाश का प्रयोग करेगा, क्योंकि उसे
और अधिक प्रकाश प्राप्त करना है, वह निरंतर सत्य के ज्ञान की ओर अग्रसर
होता रहेगा।’’
- ‘‘बुद्धिसंगत-व्यवहार सदाचारी आचरण और तर्क के प्रयोग द्वारा सच्ची श्रेष्ठता
का प्रदर्शन करो, भौतिक वस्तुओं की तुच्छता पर गम्भीरता से ध्यान करो, और
जीवन की अस्थिरता को समझो।’’