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और कहा जाता है कि पुरस्कारस्वरूप बिम्बिसार की पाँच सौ रानियों ने अपने
सभी आभूषण जीवक को दे दिए थे।
- जीवक के अन्य उल्लेखनीय इलाजों में सम्मिलित हैं, राजगृह का वह श्रेष्ठि
जिसकी उन्होंने कपाल-छेदन की शल्य-क्रिया की थी, तथा बनारस के श्रेष्ठि
का पुत्र, जो अंतडि़यों के खिसक जाने के कारण चिरकालिक आन्त्र रोग से
पीडि़त था।
- जीवक को राजा ने अपना और रनिवास का चिकित्सक नियुक्त कर दिया
था।
- किन्तु जीवक की तथागत के प्रति अपार श्रद्धा थी। अतः वह उनके और संघ
के लिये भी चिकित्सक के रूप में कार्य करते थे।
- वह तथागत के शिष्य बन गये। तथागत ने उन्हें भिक्षु नहीं बनाया, क्योंकि वे
चाहते थे कि वह रोगियों और घायलों की सेवा करने के लिये मुक्त रहें।
- जब बिम्बिसार की मृत्यु हो गई, तो भी जीवक उनके पुत्र अजातशत्रु के भी
चिकित्सक बने रहे और पितृ-हत्या के अपराध के बाद उसको तथागत के
समीप लाने में मुख्य रूप से सहायक थे।
8. रट्ठपाल की धर्म-दीक्षा
- एक बार जब भगवान एक बहुत बड़े भिक्षुसंघ के साथ कुरु राष्ट्र में भिक्षाटन
चारिका कर रहे थे, वे थूल्लकोट्ठित में ठहरे थे, जो कुरुओं का एक नगर-क्षेत्र
कस्बा था।
- जब वहां के लोगों को इस बात का पता चला और वे भगवान बुद्ध के दर्शनार्थ
अपनी श्रद्धा प्रकट करने के लिये उनके पास गये।
- जब वे वहाँ बैठ गये, तब तथागत ने उन्हें एक धर्मोपदेश दिया। उनके उपदेश
को सुनने के उपरांत थूल्लकोट्ठित के गृहों के ब्राह्मण प्रमुखों ने सम्मानपूर्वक
उनको धन्यवाद दिया, उठे और गहरी श्रद्धा सहित प्रस्थान कर गये।
- उनके मध्य रट्ठपाल नामक एक युवक बैठा था, जो उस स्थल के एक प्रमुख
परिवार का एक वंशज था, जिसके मन में एक विचार आया ‘‘जहाँ तक मैंने
समझा है, जिस धर्म का उपदेश भगवान ने दिया है, यह उसके लिये आसान
बात नहीं है जो गृहस्थी में रहते हुए वह उसे उतनी पवित्रता, उतनी सम्पूर्णता,
शुद्धता और पूर्णता के साथ उच्च जीवन व्यतीत करे।’’