8. रट्ठपाल का धर्मांतरण - Page 169

140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘कैसा हो यदि मैं दाढ़ी और बाल कटवा लूँ, काषाय वस्त्र धारण करके गृह

का परित्याग करके प्रवजित हो जाऊँ और घर-बारी से वे घर-बस्ति।’’

  1. जब ब्राह्मण गृहपति अधिक दूर नहीं जा पाए होंगे, तब रट्ठपाल आया और

अभिवादन के उपरांन्त, भगवान को अपना विचार प्रकट किया, जो उसके मन

में आया था और उनके अंतर्गत संघ में प्रव्रज्या और उपसम्पदा देने का निवेदन

किया।

  1. तथागत ने पूछा, ‘‘रट्ठपाल, क्या तुम्हारे पास इस कार्यवाही के लिये तुम्हारे

माता-पिता की अनुमति है?’’

  1. ‘‘नहीं, भगवान।’’

  2. ‘‘जिनके पास उनके माता-पिता की अनुमति नहीं होती। मैं उन्हें प्रवज्जित नहीं

करता ।’’

  1. युवक ने कहा, ‘‘भगवान! मैं उस अनुमति को प्राप्त करने का प्रयास करूँगा’’

और उठ कर भगवान से श्रद्धापूर्वक आज्ञा लेते हुए अपने माता-पिता के पास

गया, उन्हें अपने विचारों को बताया और उनसे अपने भिक्षु बनने की अनुमति

मांगी।

  1. माता-पिता ने इस प्रकार उत्तर दिया, ‘‘प्रिय रट्ठपाल, तुम हमारे इकलौते पुत्र हो,

हमें बहुत प्यारे और दुलारे हो, तुम आराम में रहते हो और आराम से पले-बढ़े

हो, तुम्हें कष्ट का कोई अनुभव नहीं है। जाओ! खाओ, पियो, मौज करो, और

पूर्ण सुख के साथ अच्छे कार्य करो। हम अपनी अनुमति देना अस्वीकृत करते

हैं।

  1. ‘‘तुंम नहीं रहोगे तो हमारा जीना दूभर हो जाएगा, हमारे लिये जीवन में कोई

आनन्द नहीं रह जायेगा, हम तुम्हें जीते-जी एक भिक्षु के रूप में गृह का

परित्याग कर प्रव्रजित होने की अनुमति क्यों दें?’’

  1. दूसरी और तीसरी बार भी रट्ठपाल ने अपना निवेदन दोहराया, परंतु उसे अपने

माता-पिता से वही अस्वीकृति मिली।

  1. इस प्रकार अपने माता-पिता की अनुमति प्राप्त करने में असफल हो कर, युवक

स्वयं नंगी-जमीन पर लेट गया यह घोषणा करते हुए कि ‘‘या तो वह वहीं मर

जायेगा या भिक्षु बनेगा।’’

  1. उसके माता-पिता ने उसके भिक्षु बनने के प्रति अपने विरोधों को दोहराते हुए

उससे उठ-बैठने का अनुनय-विनय किया, किन्तु नवयुवक एक भी शब्द नहीं