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बोला। दूसरी और तीसरी बार भी उन्होंने उससे अनुनय-विनय किया, परंतु फिर
भी वह एक भी शब्द नहीं बोला।
- अतः माता-पिता ने रट्ठपाल के साथियों को बुलवाया, जिन्हें उन्होंने यह सब
बताया और उनसे अपनी ओर से आग्रह करने को कहा जो कुछ उसके माता-पिता
ने उससे कहा था।
- तीन बार उसके साथियों ने उससे निवेदन किया, परंतु फिर भी वह एक भी शब्द
नहीं बोला। अतः उसके साथी माता-पिता के पास इस सूचना के साथ आयेः
‘‘वह वहाँ नंगी जमीन पर लेटा है, यह घोषणा करते हुए कि या तो वह वहीं
मर जायेगा या एक भिक्षु बनेगा। यदि आप अपनी अनुमति नहीं देंगे, वह कभी
जीवित नहीं उठेगा। किन्तु, यदि आप अपनी अनुमति दे देंगे, तो आप उसको
जीवित देख सकेंगे। यदि एक भिक्षु बना रहना उसे अच्छा नहीं लगेगा, तो उसके
पास वापस लौटने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं होगा। केवल यहां वापस
आना ही बचेगा। कृपया अपनी अनुमति दे दें। ’’ उन्होंने आग्रह किया।
- ‘‘हाँ हम अनुमति देते हैं, किन्तु जब तक वह एक भिक्षु रहेगा, तो वह अवश्य
हमसे मिलने के लिए आया करेगा।’’
- अब उनके साथी रट्ठपाल के पास गये और उन्होंने उससे कहा कि उसके
माता-पिता ने अपनी अनुमति दे दी है, किन्तु जब तक वह एक भिक्षु रहेंगे,
तब तक अवश्य आना और उनसे मिलना होगा।
- तत्पश्चात् रट्ठपाल उठा और, जब उसने अपनी शक्ति पुनः प्राप्त कर ली, स्वयं
को तथागत के पास ले गया, और अभिवादन के पश्चात् एक ओर बैठ गया,
और बोला, ‘‘मैंने अपने भिक्षु बनने के लिये अपने माता-पिता की अनुमति
प्राप्त कर ली है। मैं तथागत से संघ में सम्मिलित कर लेने का निवेदन करता
हूँ।’’
- तथागत के अधीन उन्हें प्रव्रज्या और उपसम्पदा प्रदान कर दी गयी, और दो
सप्ताह के बाद तथागत, थूल्लकोट्ठित में जितना वे रुकना चाहते थे उतना
ठहरने के बाद, अपनी भिक्षाटन चारिका में श्रावस्ती की ओर बढ़ गये, जहाँ
उन्होंने अनाथपिण्डिक के विहार में जेतवन में अपना निवास बनाया।
- अकेले और अलग निवास करते हुए उद्यम, उत्साह एवं स्वयं के शुद्धिकरण
द्वारा, भिक्षु रट्ठपाल ने शीघ्र ही उस उद्देश्य को अर्जित कर लिया, जिसकी
खोज में नवयुवक गृह का परित्याग कर एक भिक्षु के रूप में प्रव्रजित होते हैं-
वह है मानव-जीवन का श्रेष्ठतम आदर्श।