142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- तब, वे भगवान के पास गये और, अभिवादन के पश्चात् एक ओर बैठने के
बाद कहा कि भगवान की अनुमति से, वे अपने माता-पिता से मिलने के लिए
जाना चाहते हैं।
- स्वयं भगवान बुद्ध ने अपने चित्त से रट्ठपाल के चित्त के विचारों का अवलोकन
कर के, और उनके संबंध में यह स्वीकार करते हुए कि वे अपने प्रशिक्षण का
परित्याग करने और एक गृहस्थ के निम्न जीवन में पुनः लौट जाने में असमर्थ
हैं। भगवान ने उन्हें जब वे चाहें जाने की अनुमति दे दी।
- इसके तुरंत बाद उठकर और भगवान से गंभीर श्रद्धापूर्वक आज्ञा लेकर, रट्ठपाल
अपना बिस्तर ठीक से रख कर, अपने चीवर और पात्र के साथ थूल्लेकोट्ठित
की एक भिक्षाटन चारिका के लिये निकल पड़े जहाँ उन्होंने अपना निवास कुरु
राजा के मृग-उद्यान में बनाया।
- अगली सुबह प्रातःकाल, भली-भांति चीवर पहन और हाथ में भिक्षा पात्र लेकर,
वे भिक्षा के लिए निगम में गये, और वहाँ अपनी बिना भेद-भाव की परिक्रमा
में एक घर से दूसरे घर होते हुए, वे अपने पिता के घर पहुँचे।
- घर के अन्दर कक्ष के मध्य दरवाजे के भीतर, उनके पिता अपने बालों को
कंघी से सँवार रहे थे और रट्ठपाल को, कुछ दूरी से आते हुए देख, उन्होंने
कहा, ‘‘ऐसे ही सरमुँडे प्रव्रजितों ने मेरे प्रिय इकलौते एवं दुलारे पुत्र को भिक्षु
बनाया था।’’
- अतः स्वयं अपने पिता के घर में रट्ठपाल को कुछ नहीं दिया गया, यहाँ तक
कि इन्कार भी नहीं_ जो कुछ उन्हें मिला वे थीं गालियाँ।
- इसी क्षण परिवार की एक दास कन्या पिछले दिन का बासी चावल फेंकने
वाली थी, और रट्ठपाल ने उससे कहाः ‘‘बहन, यदि यह फेंके जाने वाले हैं,
इन्हें यहाँ मेरे पात्र में डाल दो।’’
- जब दासी ऐसा कर रही थी, तब उसने उनके हाथों, पांवों और आवाज को
पहचान लिया, और अपनी मालकिन के पास सीधे जाकर रोते हुए बोली,
‘‘मालकिन! क्या आपको मालूम है, छोटे मालिक वापस लौट आये हैं।’’
- मां ने कहा, ‘‘यदि जो तुमने सत्य कहा है, तो तुम इसी क्षण दासता के बंधन
से मुक्त हुई, ‘‘वह शीघ्रता से अपने पति को सूचित करने गयी कि उसने सुना
है कि उनका पुत्र वापस लौट आया है।’’
- रट्ठपाल उस बासी चावल को झाड़ी के नीचे बैठे खा रहे थे। जब उनके पिता