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आये, वे बोले_ ‘‘क्या यह हो सकता है कि, मेरे प्रिय पुत्र, तुम बासी चावल
खा रहे हो? क्या तुम्हें स्वयं अपने घर नहीं आना चाहिए था?’’
- रट्ठपाल ने कहा, ‘‘गृहपति! हम बे-घर हैं, गृह का परित्याग कर प्रव्रजित हो
चुके हैं, ऐसे लोगों का अपना घर क्या है? हाँ, मैं तुम्हारे घर आया था, जहाँ
मुझे कुछ नहीं दिया गया था, यहाँ तक कि इन्कार भी नहीं, जो कुछ मुझे
मिला वे थीं-गालियाँ।’’
- ‘‘आओ, मेरे पुत्र! आओ हम घर के अन्दर चलें।’’ ‘‘ऐसा नहीं, गृहपति! मैंने
आज का अपना भोजन समाप्त कर लिया है।’’ रट्ठपाल ने कहा।
‘‘ठीक है मेरे पुत्र कल का भोजन करने का वचन दो।’
अपने मौन द्वारा भिक्षु रट्ठपाल ने स्वीकृति दी।
तब पिता घर के भीतर गये, जहाँ सर्वप्रथम उन्होंने सोने और चाँदी के विशाल
ढेर लगाए और उसे चटाई से ढँक देने की आज्ञा दी और तब उन्होंने अपनी
पुत्र-वधुओं से कहा, ‘‘जो पहले भिक्षु रट्ठपाल की पत्नियाँ थीं, वे स्वयं को
अच्छे से अच्छे तरह से अलंकृत करें, जिस तरह से उनका पति उन्हें अलंकृत
देखना चाहा करता था।’’
- जब रात बीत गई, पिता ने अपने घर में बढि़या भोजन तैयार करने की आज्ञा
देकर अपने पुत्र को बताया कि भोजन तैयार हो गया। उस पूर्वाह्न में, भिक्षु
रट्ठपाल, भलि-भांति चीवर पहन और हाथ में भिक्षा-पात्र ले कर, आये और
अपने लिये सज्जित आसन पर बैठे।
- इसके तुरंत बाद, सोना-चाँदी के ढेरों को खोल देने की आज्ञा देकर पिता ने
कहा, ‘‘यह तुम्हारी माँ का धन है, वह तुम्हारे पिता का धन है और वह तुम्हारे
दादा से चला आ रहा है। तुम्हारे पास स्वयं भोगने और पुण्य-कार्य करने दोनों
के लिये सम्पत्ति है।’
- ‘‘आओ, मेरे पुत्र! अपने श्रमण-चर्या का परित्याग करो, गृहस्थ के निम्न जीवन
में पुनः लौट आओ, अपनी धन-सम्पत्ति को भोगो और अच्छे कार्य करो।’’
- ‘‘रट्ठपाल ने उत्तर दिया, गृहपति! यदि तुम मेरी सलाह मानो तो तुम इस सारे
ढेर लगे खजाने को गाड़ी में लादकर ले जाओ और गंगा नदी के मध्य में इसे
डुबो दो। और ऐसा क्यों? क्योंकि इसके कारण तुम्हें केवल दुःख, विलाप,
विपत्ति, चित्त और काय की पीड़ा तथा कष्ट ही मिलेगा।’’