144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- उसके चरणों से लिपट कर, भिक्षु रट्ठपाल की पूर्व पत्नियाँ पूछने लगीं कि
आखिर वे अप्सरायें कैसी हैं, जिनके लिये वे ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत कर
रहे हैं।
रट्ठपाल ने उत्तर दिया, ‘‘बहनों! किन्हीं भी अप्सराओं के लिये नहीं।’’
स्वयं को बहनों कहा जाना सुन कर, सभी स्त्रियां बेहोश हो गयीं और जमीन
पर गिर पड़ीं।
- रट्ठपाल ने अपने पिता से कहा, ‘‘गृहपति! यदि भोजन कराना है तो कराओ,
कष्ट मत दो।’’
- ‘‘मेरे पुत्र! भोजन, तैयार है, प्रारम्भ करो,’’ पिता ने कहा और उसने बढि़या
भोजन श्रद्धा भाव से परोसा जब तक कि उनके पुत्र की तृप्ति नहीं हो गई।
- भोजन करने के बाद रट्ठपाल कुरु राजा के मृग-उद्यान की ओर चले गये, जहाँ
वे मध्या“न की गर्मी में एक वृक्ष के नीचे बैठ गये।
- उसी समय राजा ने अपने शिकारी को निर्देश दे रखे थे कि वह उनके वहाँ
आने से पहले उद्यान को ठीक-ठाक करके रखें, और आज्ञाकारी शिकारी अपने
काम में लगा हुआ था, जब उसने मध्या“न की गर्मी में रट्ठपाल को एक वृक्ष
के नीचे बैठे देखा, उसने राजा को सूचित किया कि उद्यान ठीक-ठाक है, परंतु
एक वृक्ष के नीचे रट्ठपाल, नवयुवक-भद्रपुरुष, जिनके विषय में महाराज ने
प्रायः सुना है, बैठे हैं।
- राजा ने कहा, ‘‘आज उद्यान के विषय में भूल जाओ,’’ ‘‘मैं उन भिक्षुओं के
दर्शन करूँगा।’’ अतः जितना भी भोजन तैयार किया गया था उसे तैयार रखने
को कहकर, वह रथ पर सवार हो कर राजकीय शैली में जुलूस के साथ नगर
के बाहर रट्ठपाल के दर्शन करने चल पड़ा।
- जहाँ तक जमीन उनके रथ के लिये उपयुक्त थी, रथ पर सवार होकर और
उसके बाद अपने राजकीय जुलूस के साथ पैदल चल कर, राजा अन्ततोगत्वा
भिक्षु रट्ठपाल के पास पहुंचे, जिन्हें, विनम्र अभिवादन के पश्चात् स्वयं अभी
तक खड़े ही हुए, फूलों की एक ढेरी पर बैठने के लिये आमंत्रित किया।
‘‘नहीं राजन्! आप वहाँ बैठें, मैं अपने स्थान पर बैठा हूँ।’’
उनको संकेत किए गये आसन पर स्वयं बैठते हुए, राजा ने रट्ठपाल से कहा,
‘‘चार प्रकार की हानियाँ हैं, जो मनुष्य को बाल और दाढ़ी कटवाने, काषाय चीवर