2. यशोधरा और राहुल की भेंट - Page 181

152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

साहस का वर्णन किया, जो उसने दिखलाया था, जब उन्होंने प्रव्रज्या ग्रहण की

थी। उसकी पवित्रता, उसकी सौम्यता और उसकी श्रद्धा एक बोधिसत्व के रूप

में उनके लिए अमूल्य थी, जब वे मनुष्य के सर्वोच्च उद्देश्य बोधि को प्राप्त

करने के लिये प्रयत्नशील थे। यह तब, उसका कर्म था, और यह उसके महान

पुण्यों का ही परिणाम था।

  1. यशोधरा का दुख अकथनीय था और कान्ति जो उसके आध्यात्मिक उत्तराधिकार

के चारों ओर फैली थी, उसके जीवन काल में उसके महान व्यवहार द्वारा बढ़

गई और उसे एक विशिष्ट व्यक्ति बना दिया था।

  1. तब यशोधरा ने राहुल को, जो अब सात वर्ष का था, एक राजकुमार की तरह

सजाया और उससे, कहाः

  1. ‘‘यह श्रमण, जिसका रूप-रंग इतना गरिमापूर्ण है कि यह महाब्रह्म जैसे लगते

हैं, तुम्हारे पिता हैं। उनके पास अक्षय निधि है, जिसे मैंने अभी तक देखा नहीं

है। उनके पास जाओ तथा उनसे तुम्हें वह अक्षय निधि देने को कहो, क्योंकि

पुत्र को अपने पिता की सम्पत्ति उत्तराधिकार में पाने का अधिकार होता है।’’

  1. राहुल ने उत्तर दियाः ‘‘कौन मेरा पिता है? मैं तो शुद्धोदन के अतिरिक्त किसी

पिता को नहीं जानता हूँ।’’

  1. यशोधरा ने लड़के को अपनी बांहों में उठाया और खिड़की से भगवान को

दिखलाया, जो समीप ही थे, भिक्षुओं के मध्य भोजन ग्रहण कर रहे थे, उसे

बतलाते हुए कि वह उसके पिता हैं और शुद्धोदन नहीं।

  1. राहुल तब उनके पास गया और उनके मुख की ओर देखते हुए, बिना किसी

भय के स्नेह-स्निग्ध स्वर में बोलाः

  1. ‘‘क्या आप मेरे पिता नहीं हैं?’’ और उनके समीप खड़े होकर, उसने आगे

कहा, ‘‘ओ श्रमण! यहाँ तक कि आपकी परछाई भी बड़ी सुखकर है।’’ तथागत

मौन ही रहे।

  1. जब तथागत ने अपना भोजन समाप्त कर लिया, उन्होंने आशीर्वाद दिये और

महल से दूर चले गये, किन्तु राहुल ने अनुसरण किया और अपना उत्तराधिकार

माँगा।

  1. किसी ने भी बालक को नहीं रोका और न ही स्वयं तथागत ने भी।

  2. तब तथागत ने सारिपुत्र की ओर देखा और कहा, ‘‘मेरा पुत्र अपने उत्तराधिकार