3. शाक्यों द्वारा स्वागत - Page 183

154 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. तब महानाम अनुरुद्ध के पास गया और कहा, ‘‘या तो तुम संसार का त्याग

दो, या मैं ऐसा करुँगा।’’ अनुरुद्ध ने उत्तर दिया, ‘‘मैं सुकुमार हूँ। मेरे लिये

गृह-परित्याग कर प्रव्रजित होना असंभव है। तुम ऐसा करो।’’

  1. ‘‘किन्तु आओ, प्रिय अनुरुद्ध! मैं तुम्हें बताता हूँ कि गृहस्थ-जीवन में क्या

करना पड़ता है। सबसे पहले, तुम्हें अपने खेतों को जुतवाना होता है। जब वह

हो गया, तुम्हें उनकी बोआई करानी होती है। जब वह हो गया, तुम्हें उन्हें पानी

से सिंचवाना होता है। जब वह हो गया, तुम्हें पुनः पानी निकलवाना होता है।

जब वह हो गया, तो खर-पतवार उखड़वाना होता है। जब वह हो गया, तुम्हें

फसल को कटवाना होता है। जब वह हो गया, तुम्हें फसल को ढोकर उठवा

ले जाना होता है। अब वह हो गया, तुम्हें उसको गट्ठरों के रूप में बंधवाना

होता है। जब वह हो गया, तुम्हें उन्हें बैलों से रौंदवाना होता है। जब वह हो

गया, तुम्हें तिनके चुनवा कर बाहर निकलवाने होते हैं। जब वह हो गया, तुम्हें

भूसी हटवानी होती है। जब वह हो गया, तुम्हें उसे ओसवाना होता है। जब वह

हो गया, तुम्हें फसल को कोठों से भरवाना होता है। जब वह हो गया, तुम्हें

ठीक इसी प्रकार अगले वर्ष करना होगा और ठीक ऐसा ही उसके बाद आने

वाले वर्षों में भी करना होगा।’’

  1. ‘‘काम कभी समाप्त नहीं होता है, मनुष्य कभी भी अपने श्रम का अंत नहीं

देखता है। ओह, कब हमारा काम समाप्त होगा? कब हम अपने श्रमों का अंत

देख पाएंगे? कब हम, अपनी पाँच इन्द्रियों के सुखों को नियन्त्रित करते और

भोगते हुए भी, आराम से रह सकेंगे? हाँ, प्रिय अनुरुद्ध, काम कभी समाप्त

नहीं होता_ हमारे श्रमों का कोई अन्त नहीं दिखता है?’’

  1. अनुरुद्ध बोला, ‘‘तब क्या तुम गृहस्थ-कत्तव्यों को संभालने का विचार रखोगे।

मैं ही गृह का परित्याग कर प्रव्रजित हो जाऊँगा।’’

  1. और तब अनुरुद्ध शाक्य अपनी माँ के पास गया, और उनसे कहा, ‘‘माँ! मैं

गृहस्थ-जीवन का परित्याग कर प्रव्रजित होना चाहता हूँ। मुझे ऐसा करने के

लिये अपनी अनुमति दीजिए।’’

  1. और जब अनुरुद्ध शाक्य के ऐसा कहने पर उसकी माँ ने अनुरुद्ध को उत्तर

दिया, ‘‘अनुरुद्ध! तुम दोनों, मेरे दो पुत्र हो, मुझे अत्यन्त प्रिय हो, जिनमें मैं

कोई बुराई नहीं पाती हूँ। किसी दिन, मृत्यु आने पर न चाहते हुए भी मैं तुमसे

पृथक हो जाऊँगी, किंतु किन्तु जीते जी कैसे तैयार हो सकती हूं कि तुम गृहस्थ

जीवन का परित्याग करने की अनुमति दूं कि प्रव्रजित हो जाओ?’’