3. शाक्यों द्वारा स्वागत - Page 184

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  1. और दूसरी बार भी अनुरुद्ध ने वही प्रार्थना दोहराई, और वही उत्तर मिला। और

तीसरी बार भी अनुरुद्ध ने वही प्रार्थना अपनी माँ से की।

  1. उस समय भद्दिय नामक शाक्य राजा शाक्यों पर शासन करता था और वह

अनुरुद्ध का मित्र था। और अनुरुद्ध की माँ, यह सोचते हुए कि राजा संसार का

परित्याग करने में समर्थ नहीं हो सकता, अपने पुत्र से बोली, ‘‘प्रिय अनुरुद्ध!

यदि शाक्य राजा भद्दिय संसार का परित्याग कर दे, तो तुम भी उसके साथ जा

सकते हो।’’

  1. तब अनुरुद्ध भद्दिय के पास गया और उससे कहा, ‘‘प्रिय मित्र! मेरी प्रव्रज्या

‘‘में तुम बाधक हो रहे हो। प्रिय मित्र! यदि।’’

  1. ‘‘मैं बाधक हूं तो तब वह बाधा, दूर कर दी जाये। मैं तुम्हारे साथ हूँ। अपनी

इच्छा के अनुसार संसार का परित्याग करो।’’

  1. ‘‘आओ प्रिय मित्र! हम दोनों एक साथ संसार का परित्याग करें।’’

  2. भद्दिय बोला, ‘‘प्रिय मित्र, मैं गृहस्थ जीवन को छोड़ने में असमर्थ हूँ। इसके

अतिरिक्त जो कुछ भी तुम मुझसे कहो, मैं वह करूँगा। तुम अकेले ही प्रव्रजित

हो जाओ!’’

  1. ‘‘प्रिय मित्र! माँ ने मुझे कहा है कि यदि तुम प्रव्रजित होओ तो मैं भी कर

सकता हूँ। और तुमने अभी-अभी कहा है, ‘‘यदि तुम्हारी प्रव्रज्या मेरे द्वारा बाधित

होती है, तब उस बाधा को दूर हो जाने दो। तुम्हारे साथ ही तुम्हारी इच्छा के

अनुसार मैं संसार का परित्याग करूँगा। तब आओ, प्रिय मित्र! हम दोनों संसार

का त्याग करें।’’

  1. और शाक्य राजा भद्दिय ने अनुरुद्ध से कहा, ‘‘मेरे मित्र! सात वर्ष तक प्रतीक्षा

करो। सात वर्षों की समाप्ति पर हम एक साथ संसार का परित्याग करेंगे।’’

  1. ‘‘सात वर्ष का समय तो बहुत लम्बा है, प्रिय मित्र! मैं सात वर्ष तक प्रतीक्षा

करने में समर्थ नहीं हूँ।’’

  1. भद्दीय ने प्रस्ताव को छः वर्ष और यहाँ तक कि एक वर्ष, सात महीने और

यहाँ तक की एक महीना, और एक पखवारे तक कम किया। प्रत्येक प्रस्ताव

पर अनुरुद्ध ने उत्तर दिया, ‘‘प्रतीक्षा करने के लिए बहुत लम्बा समय है।’’

  1. तब राजा भद्दिय ने कहा, ‘‘मेरे मित्र! सात दिन तक प्रतीक्षा करो, जब तक मैं

अपने पुत्रों और अपने भाइयों को राज्य सौंप दूँ।’’