4. गृहस्थ बनाने का अंतिम प्रयास - Page 185

156 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘सात दिन बहुत लम्बा समय नहीं है। इतने दिन मैं प्रतिक्षा करूँगा,’’ यह

अनुरुद्ध का उत्तर था।

  1. अतः शाक्य राजा भद्दिय, अनुरुद्ध, आनन्द, भृगु, किम्बिल और देवदत्त जिस

प्रकार वे प्रायः चतुरंगी सेना के साथ क्रीड़ा-उद्यान जाया करते थे, उसी प्रकार

वे चतुरंगी सेना के साथ अब भी बाहर निकले और उपालि नाई उनके साथ

गया। इस प्रकार कुल मिलाकर उनकी संख्या सात हो गयी।

  1. और जब वे कुछ दूर चले गये तो उन्होंने अपनी सेना को वापस कर दिया और

सीमा पार कर पड़ोसी जनपद में प्रवेश किया, और अपने सुन्दर गहनों इत्यादि

को उतार कर उन्हें अपने वस्त्रों में लपेट कर उनकी एक गठरी बनाई और

उपालि नाई से कहा, ‘‘क्या तुम अब, भले उपालि! वापस कपिलवस्तु चले

जाओगे। ये वस्तुयें तुम्हारा गुजर-बसर करने के लिये पर्याप्त होंगी। हम जायेंगे

और तथागत शरण ग्रहण करेंगे।’’ और इस प्रकार वे आगे बढ़ गये।

  1. वे आगे बढ़ गये और उपालि ने वापस घर लौटने के उद्देश्य से विदा ली।

4. तथागत को गृहस्थ बनाने का अंतिम प्रयास

  1. शुद्धोदन यह सोच कर कि उनका पुत्र दूर जा रहा है और दुबारा कभी नहीं

देख सकेगा, फूट-फूट कर रोये।

  1. तब शुद्धोधन अपने मंत्री एवं अपने पारिवारिक पुरोहित से बोले और उनसे पूछा

कि क्या वे जाकर उनके पुत्र को रुके रहने और परिवार में सम्मिलित होने के

लिये राजी कर सकते हैं।

  1. पारिवारिक पुरोहित मंत्री के साथ, राजा की इच्छाओं का अनुसरण करते हुए

गये और मार्ग में ही वे उनके पास जा पहुंचे

  1. उन लोगों ने तथागत काय थोचित अभिवादन किया, और उनकी आज्ञा पाकर,

उनके समीप बैठ गये।

  1. जब तथागत वृक्ष की छाया के नीचे बैठ गये, तब पारिवारिक पुजारी ने तथागत

से निवेदन किया।

  1. ‘‘हे राजकुमार, एक क्षण के लिये राजा की भावनाओं के विषय में सोचो

जिसकी आंखों से आँसुओं की बरसात हो रही है और जिसके हृदय में आपकी

जुदाई का तीर बिंधा हुआ है। उन्होंने आपसे घर लौट आने का आग्रह किया

है। केवल तब ही वह शांति से मर सकेंगे।’’