5. बुद्ध का उत्तर - Page 186

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  1. ‘‘मैं जानता हूँ कि आपका संकल्प धर्म पर केन्द्रित है, और मैं यह भी समझता

हूँ कि आपका यह उद्देश्य अपरिवर्तनीय है, किन्तु आपके इस बेघर अवस्था में

जाने से वेदना के समान अग्नि की ज्वाला से उनका हृदय जल रहा है।’’

  1. ‘‘आइये! आप जिस (धर्म) कर्त्तव्य को चाहते हैं, अपने कर्त्तव्य के लिये इस

उद्देश्य का त्याग कर दीजिये।’’

  1. ‘‘कुछ समय के लिये पृथ्वी के आधिपत्य का आनन्द लीजिये बाद में आप

शास्त्रों द्वारा दिये गये समय पर वन में जा सकते हैं, अपने दुखी सम्बन्धियों के

प्रति अनादर न दर्शायें। सभी के प्रति करुणा ही सच्चा धर्म है।’’

  1. ‘‘धर्म की साधना केवल वन में ही नहीं होती है, तपस्वियों की मुक्ति नगर

में भी प्राप्त की जा सकती है। ज्ञान और प्रयास ही सच्चे साधन हैं, वन और

साधू-वेष केवल एक कायर के लक्षण हैं।’’

  1. ‘‘शाक्यों का राजा दुख के गहरे सागर में डूब रहा है, जो कष्टों की लहरों से

भरा हुआ है, जो आपसे पैदा हो रही हैं, अतः आप उन्हें बाहर निकालें जो

असहाय और असुरक्षित हैं, जैसे एक गाय सागर में डूब रही हो।’’

  1. ‘‘और उस रानी प्रजापति गोतमी का भी ख्याल करो, जिन्होंने तुम्हें पाल-पोस

कर बड़ा किया, जो अभी तक अगस्त्य-लोक नहीं पधारी हैं, क्या आप उनकी

तनिक भी चिन्ता नहीं करेंगे, जो एक गाय के समान निरन्तर दुखी हो रही है,

जिसने अपना बछड़ा खो दिया है?’’

  1. निश्चय ही आप अपने दर्शनों द्वारा अपनी पत्नी को सहायता देंगे, जो अभी से

एक विधवा की तरह विलाप कर रही है, जबकि अभी तक उसका पति जीवित

है, जैसे कि हंसिनी जो अपने साथी से बिछुड़ गयी हो या एक हथिनी, जिसे

जंगल में उसके साथी ने छोड़ दिया हो।

  1. तथागत ने पारिवारिक पुरोहित के वचनों को सुनकर, एक क्षण तक मनन किया,

धर्मात्मा के सभी सद्गुणों को जानते हुए और तब अपना सौम्य उत्तर इस प्रकार

दिया-

5. भगवान बुद्ध का उत्तर

  1. ‘‘मैं राजा के पितृ-वात्सल्यपूर्ण भावों से भली-भाँति परिचित हूँ, विशेष कर

वह, जो उन्होंने मेरे प्रति दर्शाया है, फिर भी यह सब जानते हुए जैसा कि मैं

जानता हूँ, संसार में व्याप्त कष्ट और दुःख से सतर्क, मैं अपने सम्बन्धियों को

त्यागने के लिये अपरिहार्य रूप से बाध्य हूँ।’’