158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘कौन अपने प्रिय सम्बन्धियों को देखना नहीं चाहता है, यदि प्रियजनों से यह
वियोग अस्तित्व में नहीं होता? किन्तु, एक बार होने पर भी, वियोग फिर दोबारा
आकर रहेगा, इसलिये ही मैं अपने हालाँकि प्रिय पिता को छोड़ कर जा रहा
हूँ।’’
- ‘‘हालाँकि मैं इसे ठीक नहीं समझता हूँ कि आप लोग सोचें राजा को दुख मेरे
कारण हुआ है, जबकि अपने स्वप्नवत् समागमों के मध्य, वे भविष्य के वियोगों
के विचारों से दुखी हैं।’’
- ‘‘अतः इस विषय में तुम्हारा मत निश्चित विभिन्न होना चाहिये। वियोग के
नाना-नाना रूप देख लेने के उपरान्त, न तो एक पुत्र और न ही सम्बन्धी दुख
का कारण हैं, यह दुख केवल अज्ञान द्वारा उत्पन्न है।’’
- ‘‘क्योंकि सभी प्राणियों के लिये समय अवधि में पृथक होना अनिवार्य रूप से
निश्चित है, जैसा कि यात्रियों का, जो एक मार्ग पर इकट्ठे तो होते हैं, तो एक
बुद्धिमान व्यक्ति क्यों दुख संजोए रखेगा, जब वह अपने सम्बन्धियों को खोता
है, भले ही वह उन्हें प्रेम करता हो?’’
- अपने सम्बन्धियों को दूसरे लोक में छोड़कर, मनुष्य इधर प्रस्थान कर जाता है
और उन्हें चुपके से यहाँ छोड़कर, वह पुनः आगे निकल जाता है_ उधर जाने
के बाद, वह अन्यत्र भी चला जाता है, ऐसा मानव-मात्र का भाग्य है, एक
मुक्त मनुष्य उनके लिये क्या सोच-विचार करे?
- ‘‘क्योंकि माँ के गर्भ से बाहर निकलने के क्षण से ही मृत्यु एक आवश्यक
है, तो क्यों अपने पुत्र के लिये अपनी अनुरक्ति, आपने मेरे वन में प्रस्थान को
असमय कहा है?’’
- ‘‘मनुष्य द्वारा एक सांसारिक वस्तु को प्राप्त करने में एक समय हो सकता है,
समय निस्सन्देह सभी वस्तुओं के साथ अपृथक्करणीय रूप में संलग्न कहा गया
है। समय संसार को इसके सभी विभिन्न परिवर्तनों में घसीटता है, किन्तु एक
परमानन्द के लिये सभी समय उचित हैं, जो वास्तव में प्रशंसा के योग्य है।
- ‘‘यह कि राजा अपना राज्य मुझे सौंपना चाहते हैं, यह एक उच्च विचार है, जो
एक पिता के योग्य है_ किन्तु इसे स्वीकार करना मेरे लिये उसी प्रकार अनुचित
होगा, जैसे कि एक रोगी मनुष्य लालच के कारण हानिकर भोजन स्वीकार कर
ले।’’
- ‘‘किस प्रकार एक बुद्धिमान व्यक्ति के लिये राजसत्ता में प्रवेश करना उचित हो