1. गँवार ब्राह्मणों की धर्म-दीक्षा - Page 194

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होगा यही सभी प्राणियों की अवस्था है, अतः जन्म और मृत्यु से छुटकारे की

इच्छा करना, यही धार्मिक सत्य में स्वयं को लगाने की क्रिया है।’’

  1. सत्तर ब्राह्मणों ने ये वचन सुन कर, तुरन्त श्रमण बनने की इच्छा प्रकट की,

बुद्ध द्वारा अनुमीत मिल जाने पर, उनका केश-छेदन, और वे सच्चे शिष्यों के

रूप में प्रस्तुत हो गये।

  1. तब वे विहार की ओर चल पड़े, और मार्ग में उन्हें उनकी पत्नियों और परिवारों

की याद ने उन्हें कष्ट दिया, जबकि ठीक उसी समय भारी वर्षा ने उनके आगे

बढ़ना अवरुद्ध कर दिया।

  1. मार्ग के किनारे लगभग दस मकान थे, जिसमें उन्होंने आश्रय खोजा, किन्तु

उनमें से एक के भीतर जाने पर यह पाया कि छत के जरिये पानी टपक रहा

था, और वर्ष से बहुत कम बचाव सम्भव था।

  1. इस पर बुद्ध ने ये पंक्तियाँ जोड़ी और कहा, ‘‘जिस प्रकार जब एक घर की

छत ठीक से न छाई गई हो, तो वर्षा उसमें से एक रास्ता बना लेती है और

टपकने लगती है, उसी प्रकार जब विचार ध्यानपूर्वक नियन्त्रित न किये गये हों,

तृष्णाएं (कामेच्छा) हमारे सभी अच्छे संकल्पों में से रास्ता बना लेगी।’’

  1. ‘‘किन्तु जब एक छत भांति-भाँति छाई गई हो, तब पानी उससे नहीं टपक

सकता, अतः अपने विचारों पर नियंत्रण द्वारा और चिन्तन सहित कार्य करने

पर, ऐसी कोई तृष्णा उत्पन्न नहीं हो सकती या हमें तंग नहीं कर सकती।’’

  1. सत्तर ब्राह्मण, इन पंक्तियों को सुनकर समझ गये थे कि उनकी तृष्णायें निन्दनीय

थीं, फिर भी वे पूर्णतया संदेह से मुक्त नहीं थे, तथापि वे आगे बढ़ गये।

  1. जैसे वे आगे बढ़े उन्होंने पृथ्वी पर कुछ सुगंधित द्रव्य पड़ा देखा और बुद्ध ने

उस पर उनका ध्यान आकर्षित करने का अवसर उठाया_ और इसके पश्चात्,

कुछ मछली की आँते भी पड़े देख कर, उन्होंने उनका ध्यान उनकी गंदी महक

की ओर आकर्षित किया और तब इन पंक्तियों को जोड़ा और कहाः

  1. ‘‘जो निम्न और नीच से मेल-जोल रखता है, वैसा ही चरित्र पा लेता है, जिस

प्रकार जो दुर्गन्धयुक्त पदार्थ का स्पर्श करता है, तो उसके शरीर में भी दुर्गंध

आने लगती है। और पूर्णतया बिना किसी कारण के, वह स्वयं को दुष्टता में

दक्ष कर लेता है।’’