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छन्न कपिलवस्तु का मूल निवासी था और शुद्धोदन के घर में दास था।
धनिय राजगृह का निवासी था, वह कुम्हार था।
कप्पत-कुर श्रावस्ती का एक निवासी था। स्वयं की आजीविका के लिये, वह
केवल एक ही तरीका जानता था कि चीथड़े पहन कर, हाथ में खप्पर लिये
चावल की भीख माँगते घूमना। अतः कप्पत-कुर-‘चीथड़े और चावल’ नाम से ही
जाना जाने लगा था। बड़ा होने पर, वह अपना गुजारा घास बेच कर करता था। 5. इन सभी ने बुद्ध से भिक्षु बनने और संघ में प्रविष्ट होने की अनुमति चाही।
बुद्ध ने बिना झिझक के और बिना उनके निम्न जन्म या उनकी पूर्व अवस्था
की परवाह किए, उन्हें संघ में प्रविष्ट कर लिया।
5. कोढ़ी सुप्रबुद्ध की धर्म-दीक्षा
- एक समय तथागत राजगृह के निकट वेलुवन में गिरहरियों को दाना चुगाने के
स्थल पर विराजमान थे।
- उस समय राजगृह में एक कोढ़ी रहता था। जिसका नाम सुप्प्रबुद्ध था। वह
दरिद्र, दुखी और अभागा व्यक्ति था।
- उस समय ऐसा हुआ कि तथागत बड़ी भारी जनसभा के मध्य बैठकर धर्मोपदेश
दे रहे थे।
- सुप्रबुद्ध नामक कोढ़ी ने दूर से एकत्रित जन-सभा को देखा। इस दृश्य को देख
उसने सोचा- ‘निस्सन्देह वहाँ ठोस और द्रव्य दोनों प्रकार के भोजन भिक्षा में
दिए जा रहे हैं। मान लो मैं उस भीड़ के समीप पहुँच जाता हूँ तो मुझे भी
खाने के लिए भोजन या कुछ न कुछ अवश्य मिल जायेगा।
- अतः कोढ़ी सुप्रबुद्ध उस भीड़ के समीप पहुँचा और उसने तथागत को एक
बड़ी भारी भीड़ के मध्य धर्मोपदेश देते देखा। इस प्रकार, तथागत को देख कर
उसने सोचा, ‘नहीं, यहाँ भोजन की भिक्षा नहीं बँट रही है। यहां तो श्रमण गौतम
सभा में धर्मोपदेश दे रहे हैं। अच्छा तो मैं उनकी शिक्षा को सुन लूँ।’’
अतः वह यह सोचते हुए कि ‘मैं भी धर्मोपदेश सुनूँगा’ एक ओर बैठ गया।
तथागत ने अपने विचार से उस सम्पूर्ण सभा के विचारों को पढ़कर, स्वयं से
कहा, ‘‘मुझे सन्देह है कि यहाँ उपस्थित लोगों में से कौन सत्य को समझ लेने
में सक्षम है?’’ तब उन्होंने कोढ़ी सुप्प्रबुद्ध को भीड़ में बैठे देखा और उसको