1. महाप्रजापति गौतमी, यशोधरा और अन्य स्त्रियों की प्रव्रज्या - Page 207

178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘क्या तथागत ने ठीक उसी प्रकार शूद्रों को प्रव्रज्या लेने और संघ में उसी तरीके

से सम्मिलित होने की अनुमति नहीं दी है जैसे उन्होंने ब्राह्मणों को दी है? क्या

कारण है, भगवान् स्त्रियों के साथ भिन्न तरीके से व्यवहार करने का?’’

  1. ‘‘क्या तथागत समझते हैं कि स्त्रियाँ तथागत द्वारा उद्घोषित धर्म और विनय के

अधीन निर्वाण तक पहुँचने में समक्ष नहीं हैं?’’

  1. तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘आनन्द! मुझे गलत मत समझो। मैं मानता हूँ कि

स्त्रियाँ भी उतनी ही सक्षम हैं, जितने कि पुरुष निर्वाण तक पहुँचने के मामले

में। आनन्द! मुझे गलत मत समझो, मैं स्त्री-पुरुष की असमानता के सिद्धांत

को मानने वाला नहीं हूँ। महाप्रजापति की प्रार्थना पर मेरी अस्वीकृति लिंग की

असमानता पर आधारित नहीं है। वह व्यावहारिक कारणों पर आधारित है।’’

  1. ‘‘मैं प्रसन्न हूँ, भगवान्! वास्तविक कारण जानकर। किन्तु क्या भगवान् को

व्यावहारिक कारणों से उनकी प्रार्थना अस्वीकृत करनी आवश्यक है? क्या इस

प्रकार का कार्य धर्म की प्रतिष्ठा नहीं घटायेगा और इसे लिंग की असमानता

को मानने के दोषारोपण का भागी नहीं बनायेगा? क्या भगवान्! ऐसी व्यावहारिक

कठिनाइयों से बचने के लिये कुछ नियम नहीं सोच सकते हैं, जिनके कारण

भगवान् चिन्तित हैं?’’

  1. ‘‘अच्छा, आनन्द! मैं अनुमति देता हूँ, यदि महाप्रजापति आग्रह करती हैं कि

स्त्रियों को मेरे द्वारा उद्घोषित धर्म और विनय के अधीन प्रव्रज्या लेने की अनुमति

अवश्य दी जाये। किन्तु यह आठ शर्तों पर आधारित होनी चाहिए, महाप्रजापति

गौतमी स्वयं पर आठ प्रमुख नियम को लागू करने का दायित्व लें। यही उनकी

दीक्षा होगी।’’

  1. जब स्थविर आनन्द, ने तथागत से ये आठ नियम सीख लिये, तब महाप्रजापति

गौतमी के पास गये और उन्हें वह सब बताया जो तथागत ने कहा था।

  1. महाप्रजापति बोली, ‘‘आनन्द! जिस प्रकार एक पुरुष या एक स्त्री, जब युवा

और युवती स्वयं को अलंकित करने के आदी हो, जब दोनों हाथों से कमल

और चमेली के फूलों या अतिमुक्तक की एक माला ग्रहण करे और उसे अपने

सिर के ऊपर रखे इसी प्रकार मैं आनन्द! इन आठ नियमों को धारण करूँगी,

जीवनपर्यन्त उल्लंघन न होने देने के लिये वचन देती हूं।’’

  1. तब स्थविर आनन्द तथागत के पास लौट गये, उनके सामने सिर झुकाया और

एक ओर अपना आसन ग्रहण किया। और इस प्रकार बैठे हुए, स्थिवर आनन्द