2. प्रकृति नामक चाण्डालिका की प्रव्रज्या - Page 208

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ने तथागत से कहा, ‘‘भगवान! महाप्रजापति गौतमी, ने स्वयं के ऊपर नियमों

को लागू कराने का दायित्व ले लिया है, अतः वे उपसम्पदा प्राप्त मान ली

जायें।’’

  1. अब महाप्रजापति ने प्रव्रज्या-उपसम्पदा ग्रहण की, और उनके साथ आयी हुईं

पाँच सौ शाक्य-स्त्रियों ने भी उसी समय प्रव्रज्या-उपसम्पदा ग्रहण की, इस प्रकार

प्रव्रजित महाप्रजापति शास्ता के सम्मुख आयीं, और उनका अभिवादन कर, एक

ओर खड़ी हो गयीं और तथागत ने उन्हें धर्म और विनय की शिक्षा दी।

  1. अन्य पाँच सौ भिक्खुनियों को तथागत के शिष्यों में से एक नन्दक ने धर्म और

विनय की शिक्षा दी।

  1. महाप्रजापति के साथ जो शाक्य-स्त्रियाँ भिक्खुनी बनीं थी, उनमें यशोधरा भी

थी। उनकी प्रव्रज्या के उपरान्त वे भद्दा कच्चाना (भद्रा कात्यायना) नाम से

जानी जाने लगीं।

2. प्रकृति नामक चाण्डालिका की प्रव्रज्या

  1. एक समय तथागत श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन आराम में रह रहे थे।

  2. ऐसा हुआ कि एक दिन तथागत के शिष्य आनन्द नगर में भिक्षाटन के लिये

गये थे। अपना भोजन करने के पश्चात् आनन्द पानी पीने के लिये नदी की

ओर जा रहे थे।

  1. उन्होंने नदी के तट पर एक लड़की को अपना घड़ा भरते हुए देखा। आनन्द ने

उससे उन्हें थोड़ा पानी देने को कहा।

  1. लड़की, जिसका नाम प्रकृति था, ने यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि ‘‘मैं

एक चाण्डालकन्या हूं। मैं पानी नहीं दे सकती।’’

  1. आनन्द ने उत्तर दिया, ‘‘मेरा मतलब पानी से है। मेरा मतलब तुम्हारी जाति से

नहीं है।’’ लड़की ने तब अपने घड़े से थोड़ा पानी उन्हें दिया।

  1. तत्पश्चात् आनन्द जेतवन के लिये चल पड़े। लड़की ने उनका पीछा किया और

देखा कि वे कहाँ ठहरे हुए हैं और उसने यह मालूम कर लिया कि उनका नाम

आनन्द है और वे बुद्ध के शिष्य हैं।

  1. घर लौटने पर उसने अपनी माँ मातंगी को सारा वृत्तान्त बताया और जमीन पर

लेट कर रोना शुरू कर दिया।