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भाग- V

सद्धम्म क्या है? परिच्छेद एक

(क) सद्धम्म के कार्य

  1. मन के मैल को दूर कर उसे निर्मल बनाना। 257
  2. संसार को एक धम्म-‘राज्य’ बनाना। 259
Col1 d

परिच्छेद दो

(ख) धम्म तभी सद्धम्म हो सकता है, जब वह प्रज्ञा की वृद्धि करे।

  1. धम्म तभी सद्धम्म है, जब वह सभी के लिए ज्ञान के द्वार खोल दे। 263
  2. धम्म तभी सद्धम्म है, जब वह यह भी शिक्षा देता है कि केवल  266

‘विद्वान’ होना पर्याप्त नहीं, इससे मनुष्य पंडिताऊपन’ की ओर

अग्रसर हो सकता है।

  1. धम्म तभी सद्धम्म है, जब वह सिखाता है कि जिस चीज की  267

आवश्यकता है वह प्रज्ञा है। परिच्छेद तीन

(ग) धम्म सद्धम्म हो सकता है, जब वह मैत्री की वृद्धि करे।

  1. धम्म केवल तभी सद्धम्म है, जब वह शिक्षा देता है कि मात्र  270

प्रज्ञा ही पर्याप्त नहीं है इसके साथ शील का होना अनिवार्य है। 2. धम्म केवल तभी सद्धम्म है, जब वह शिक्षा देता है कि प्रज्ञा  271

और शील के साथ-साथ करुणा का भी होना अनिवार्य है।

  1. धम्म केवल तभी सद्धम्म है, जब वह यह शिक्षा देता है कि  272

करुणा से भी अधिक मैत्री की आवश्यकता है।

d Col2

परिच्छेद चार

(घ) धम्म तभी सद्धम्म हो सकता है, जब वह समस्त सामाजिक

(भेद-भावों के) प्रतिबन्ध मिटा दे।

  1. धम्म तभी सद्धम्म है जब वह मनुष्य-मनुष्य के बीच अवरोधों  276

(दीवारों) को मिटा दें।

  1. धम्म तभी सद्धम्म है, जब वह यह शिक्षा दे कि मनुष्य का जन्म  281

से नहीं बल्कि योग्यता के आधर पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए। 3. धम्म तभी सद्धम्म है जब वह मनुष्य-मनुष्य के मध्य समानता की  283

अभिवृद्धि करे।