2. डाकू अंगुलिमाल की धर्म-दीक्षा - Page 215

186 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

जाकर पकड़ लेता था। अपने पूरे प्रयास के होते हुए भी इस श्रमण को पकड़

पाने में असमर्थ ही रहा था, जबकि यह अपनी स्वाभाविक गति से बढ़ रहा है।’’

अतः वह रुक गया और चिल्लाकर तथागत को रुकने के लिए कहा। 10. जब दोनों मिले तथागत ने कहा, ‘‘अंगुलिमाल! मैं तो तुम्हारे लिये रुक गया

हूँ। क्या तुम! पाप-कर्म वाले अपने पेशे का पालन करने से रुकोगे? मैं तुम्हें

जीतने के लिये तुम्हें खोज रहा हूँ, तुम्हें धर्म-परायणता के मार्ग पर लाने के

लिये। तुम्हारे भीतर का कुशल अब तक मरा नहीं है। यदि तुम केवल उसे एक

अवसर दोगे, वह तुम्हें परिवर्तित कर देगा।’’

  1. अंगुलिमाल तथागत के वचनों से प्रभावित अनुभव करते हुए बोला, ‘‘अन्ततोगत्वा

इस मुनि ने मुझे जीत ही लिया।’’

  1. ‘‘और अब जबकि आपके दिव्य वचनों ने सदैव के लिये मुझसे पाप-कर्मों का

परित्याग करने को कहा है, मैं स्वयं को एक मौका देने के लिये तैयार हूँ।’’

अंगुलिमाल ने उत्तर दिया।

  1. अंगुलिमाल ने अपने अंगुलियों की माला, जिसे वह अपने गले में पहने रहता

था, उतार कर दूर फेंक दी और शास्ता के चरणों पर गिर पड़ा और भिक्षु संघ

में प्रवेश की याचना की।

  1. देवताओं और मनुष्यों के पथप्रदर्शक तथागत ने कहा, ‘‘भिक्षु! मेरे पीछे आओ’’ और

भिक्षु क्योंकि अंगुलिमाल के लिये सम्बोधित था, इसलिए वह भिक्षु बन गया। 15. तथागत जब श्रावस्ती में जेतवन विहार की ओर अपने मार्ग पर बढ़ रहे थे। और

अंगुलिमाल उनके भिक्षु अनुचर के रूप में। तब तथागत ने उसी समय राजा

प्रसेनजित् के आन्तरिक महल के प्रवेश-द्वार पर एक विशाल भीड़ एकत्रित

जो जोर-जोर से चिल्ला रही थी कि उसके द्वारा विजित राज्य में अंगुलिमाल

नामक एक भयानक डाकू था, जो कि विध्वंश कर रहा था और जो अपने द्व

ारा वध किये गये, शिकारों की अंगुलियों से बनी एक माला पहनने में गर्व

महसूस करता था, जन-समूह ‘‘श्रीमान्! उसका दमन करें,’’ प्रसेनजित् ने उस

भीड़ को उसे मारने का वचन दिया था।

  1. एक दिन राजा प्रसेनजित् तथागत के दर्शन के लिए जेतवान विहार गए। तथागत

ने पूछा, ‘‘राजन्! क्या बात है? क्या मगध के सेणिय बिम्बिसार या वैशाली के

विच्छवियों या किसी अन्य विरोधी शक्ति के साथ समस्या है?’’ 17. ‘तथागत! उस प्रकार की कोई समस्या नहीं है। मेरे राज्य में अंगुलिमाल नामक

एक डाकू है, जो मेरे क्षेत्र में आतंक मचा रहा है और मेरी प्रजा को सता रहा

है। मैं उसका दमन करना चाहता हूँ, किन्तु मैं असफल रहा हूँ।’’ 18. तथागत ने कहा, ‘‘राजन्! यदि आप अंगुलिमाल को देखें कि उसके बाल और