2. डाकू अंगुलिमाल की धर्म-दीक्षा - Page 216

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दाढ़ी मुंडी हुई है, वह काषाय वस्त्रों में है, वह एक भिक्षु है, वह किसी की

हत्या नहीं करता, चोरी नहीं करता, झूठ नहीं बोलता, दिन में केवल एक बार

भोजन करता है, तो और पुण्य एवं अच्छाई के साथ श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करता

है-आप उसके साथ कैसा व्यवहार करेंगे?’’

  1. ‘‘भगवान्! मैं उनका अभिनंदन करूँगा, या उनसे मिलने के लिए उठ खड़ा

होऊँगा या उन्हें बैठने के लिए आमंत्रित करूँगा या उन्हें चीवर तथा अन्य वस्तुएँ

स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करूँगा, या मैं उन्हें बचाव के लिए सुरक्षा

उपलब्ध करवाऊँगा जिसके वे अधिकारी हैं। किंतु इतना दुष्ट और इतना पतित

ऐसा शीलवान् हो ही कैसे सकता है?’’

  1. उसी समय स्थविर अंगुलिमाल तथागत के काफी निकट बैठे हुए थे, भगवान् ने

अपना दहिना हाथ आगे को बढ़ाया और कहा, ‘‘राजन्! यह अंगुलिमाल है।’’ 21. उसे देख राजा भयभीत हो गया, उसके शरीर के सारे रोंगटे खड़े हो गए। यह

देखकर तथागत ने कहा, ‘‘राजन्! भय मत लाएं, डरें नहीं, यहाँ पर डर का

कोई कारण नहीं है।’’

  1. तब राजा का भय दूर हो गया, वह स्थविर अंगुलिमाल के पास गया, और पूछा,

‘‘क्या आप स्थविर सचमुच अंगुलिमाल हैं?’’, ‘‘हाँ राजन्।’’ 23. ‘‘स्थविर! आपके पिता और माता का गोत्र क्या था?’’ ‘‘राजन्! मेरे पिता एक

गार्ग्य थे और मेरी माता एक मैत्रापणी थीं।’’

  1. ‘‘गार्ग्य-मैत्रायणी- पुत्र! यह सुन राजा प्रसन्न हुआ और बोला, ‘‘मैं आपकी

सभी आवश्यकताओं की आपूर्ति का ध्यान रखूँगा।’’

  1. अब उस समय स्थविर अंगुलिमाल अरण्य का निवासी होने, भिक्षा पर ही निर्वाह

करने और कूड़े के ढेर से उठाये तीन से अधिक कपड़े नहीं पहनने का व्रत

ले चुकने के कारण, उन्होंने इस आधार पर राजा का निमन्त्रण अस्वीकार कर

दिया कि उनके पास पहले से ही तीन चीवर उपलबध हैं।

  1. तब राजा तथागत के पास गया और अभिवादन के उपरान्त एक ओर बैठ गया

और कहा, ‘‘भगवान! यह अद्भुत है, यह आश्चर्यजनक है, तथागत जंगली को

पालतू बनाने वाले कैसे हैं, कैसे आप अदान्त को दान्त कर देते हैं और कैसे

आप अशान्त को शान्त कर देते हैं। यही एक ऐसा व्यक्ति है, जिसे मैं लाठी

और तलवार से पराजित नहीं कर पाया, किन्तु लाठी या तलवार के बिना ही

तथागत ने उसे पराजित कर दिया! और अब मुझे अवश्य चलना चाहिये, क्योंकि

मुझे पर्याप्त काम करने हैं और ध्यान देना है।’’

  1. ‘‘जब आप महाराज को अच्छा लगे।’’ तब राजा प्रसेनजित् अपने आसन से उठकर,

राजा ने विनम्रतापूर्ण एवं श्रद्धा से तथागत का अभिवादन किया और चला गया।