3. अन्य अपराधियों की धर्म-दीक्षा - Page 218

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देखा था, और न ही अपने कानों ने उनके धर्म का समाचार सुना था, तथागत

ने उनके पास जाने का निश्चय किया।

  1. अतः तथागत ने स्वयं को एक धनी घुड़-सवार मनुष्य के रूप में परिवर्तित कर

लिया! एक अच्छे घोड़े पर सवार, कन्धे पर धनुष और तलवार सहित, चाँदी

और सोने के थैले काठी से बँधे हुए, और कीमती जवाहरात घोड़े की लगाम

में जड़े हुए थे।

  1. संकीर्ण दर्रे में प्रवेश करने पर उनका घोड़ा जोर से हिनहिनाया। आवाज को सुन

कर पाँच सौ डाकू उठ खड़े हुए, और यात्री का पीछा करते हुए बोले, ‘‘हमें

कभी भी लूट का ऐसा अवसर नहीं मिला था, आओ हम उठ खड़े हों और

उसे पकड़ लें।’’

  1. उन्होंने ने घुड़सवार को घेरना चाहा ताकि वह बचकर भाग न जाए। किन्तु

उसको देखकर वे भूमि पर गिर पड़े।

  1. भूमि पर गिर पड़ने पर, वे चिल्लाये, ‘‘यह क्या भगवान है?’’ ‘‘यह क्या

भगवान है?’’

  1. इस पर घुड़सवार ने उन्हें समझाना प्रारम्भ किया कि ऐसी चोटें और दर्द जैसा

कि वे दूसरों को देते हैं और अब स्वयं उठाते हैं, कुछ नहीं हैं, नगण्य हैं-उस

दर्द के सामने जो इस दुख के कारण होता है, जो संसार में है और अविश्वास

एवं सन्देह के घावों के सामने, और केवल धर्म-ग्रन्थों पर पूर्ण एकाग्रता (सुनना)

द्वारा उत्पन्न प्रज्ञा ही ऐसे घावों को भर सकती है_ और तब उन्होंने इन वचनों

को जोड़ा और कहाः

  1. ‘‘दुख के समान बुरा कोई दुखदायी घाव नहीं है! मूर्खता के समान कोई चुभने

वाला तीर नहीं है। केवल धर्म के प्रति पूर्ण एकाग्रता ही इनका इलाज कर

सकती है। इससे ही अन्धे को दृष्टि मिलती है और अज्ञानियों को ज्ञान होते

हैं।’’

  1. ‘‘मनुष्य इसी प्रकाश को पीछे-पीछे चलते है, जैसे जो बिना नेत्रों के हों उन्हें

नेत्र दिये जायें।’’

  1. ‘‘इससे अविश्वास को दूर करने, दुःख को हटाने, आनन्द प्राप्त करने में सक्षम

है_ यह विमल प्रज्ञा उन्हीं को प्राप्त होती है, जो धमोपदेश सुनते हैं।’’ 14. ‘‘यह पद उसी का है जिसने सर्वोच्च पुण्य प्राप्त कर लिया है।’’ 15. यह सुनकर डाकू अपने बुरे जीवन पर पश्चाताप करने लगे, दुःख व अविद्या

के तीर स्वतः उनके शरीर से निकल गये और उनके घाव भर गये। 16. तब वे बुद्ध के श्रावक बन गये और विश्राम तथा शान्ति प्राप्त की।