2. भगवान् बुद्ध ने कभी किसी को मुक्ति का वचन नहीं दिया। - Page 224

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  1. दो तीन बार भगवान बुद्ध के अनुयायियों द्वारा एक उत्तराधिकारी नियुक्त करने

की प्रार्थना की गयी थी।

  1. प्रत्येक बार भगवान बुद्ध ने उसे अस्वीकार कर दिया था।

  2. उनका उत्तर था, ‘‘धम्म ही उनका अपना उत्तराधिकारी है।’’

  3. ‘‘धम्म को अपने ही द्वारा जीवित रहना चाहिये, किसी मानवीय अधिकार के

बल पर नहीं।’’

  1. ‘‘यदि धम्म को मानवीय अधिकार की आवश्यकता है, तो वह कोई धम्म नहीं है।’’
  2. ‘‘यदि हर समय धम्म का प्रभुत्व स्थापित करने के लिये संस्थापक के नाम का

आवाह्न करना आवश्यक है, तो वह कोई धम्म नहीं है।’’

  1. अपने धम्म को लेकर स्वयं अपने बारे में उनका यही दृष्टिकोण था।

2. भगवान बुद्ध ने कभी किसी को मुक्ति का वचन नहीं दिया। उन्होंने कहा कि वे मार्गदाता हैं, मोक्षदाता नहीं।

  1. अधिकतर धर्म ‘इल्हामी धर्म’ माने जाते हैं। किन्तु भगवान बुद्ध का धम्म एक

इल्हामी धर्म नहीं है।

  1. कोई भी धर्म ‘इल्हामी-धर्म’ इसलिये कहा जाता है, क्योंकि यह उसकी सृष्टि

में ईश्वर का एक संदेश या पैगाम समझा जाता है कि वे अपने रचरिया (अर्थात्

ईश्वर) की पूजा करें कि वह उनकी आत्माओं को मुक्त करे। 3. प्रायः सन्देश या पैगाम एक चुने हुए व्यक्ति के द्वारा भेजा जाता है, जो पैगम्बर

कहलाता है, जिसको यह पैगाम प्राप्त होता है और जब वह लोगों पर इसे प्रकट

करता है, तब यह धर्म कहलाता है।

  1. पैगम्बर का दायित्व है कि धर्म पर ईमान लाने वालों के लिये मुक्ति लाभ

सुनिश्चित कर दे।

  1. ईमान लाने वालों की मुक्ति का अर्थ है, उनकी रुहों को मुक्त करना, ताकि

वे दोजक में न जा सके लेकिन इसके लिए शर्त है कि वे खुदा की आज्ञाओं

का पालन कर स्वीकार करें क्योंकि पैगम्बर खुदा का पैग्राम-बर है। 6. भगवान बुद्ध ने कभी अपने को यह दावा नहीं किया कि वे एक पैगम्बर या ईश्वर

के एक दूत (या अवतार) हैं। उन्होंने ऐसे किसी भी वर्णन का खण्डन किया था।