196 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भगवान बुद्ध का धम्म एक
आविष्कार एक खोज (Discovery) है। इसे किसी भी इल्हामी-धर्म से सर्वथा
भिन्न समझना चाहिए।
- भगवान बुद्ध का धम्म इस अर्थ में एक आविष्कार या खोज है कि यह पृथ्वी
पर माननीय-जीवन की परिस्थितियों के गम्भीर अध्ययन तथा जिन स्वाभाविक
मानवीय प्रवृत्तियों (Instendts) के साथ मनुष्य का जन्म हुआ है, पूरी तरह समझने
का परिणाम है, उसकी कुप्रवृत्तियाँ और कुव्यवस्थायें, जिन्हें मनुष्य ने इतिहास व
परंपरा के परिणामस्वरूप रचा है जो उसकी विनाश का कारण बनी हुई हैं।
- सभी पैगम्बरों ने मुक्ति-दाता होने का दावा किया है। बुद्ध ने एक-मात्र ऐसे
शास्ता हैं, जिन्होंने इस प्रकार का कोई दावा नहीं किया। उन्होंने ‘मोक्ष-दाता’
और ‘मार्ग-दाता’ के मध्य सुस्पष्ट भेद रखा है, अर्थात् एक जो मुक्ति देता है
और दूसरा जो केवल मुक्ति का मार्ग दिखलाता है।
- भगवान बुद्ध केवल एक मार्गदाता थे। अपनी मुक्ति के लिए हर किसी को
स्वयं अपने आप को प्रयास करना होता है।
- उन्होंने निम्नलिखित सुत्त में ब्राह्मण मोग्गल्लान को यह बात पूर्णतया स्पष्ट कर
दी थी।
- एक बार तथागत श्रावस्ती के पूर्वाराम में मिगारमाता के प्रसाद में ठहरे हुए
थे।
- तब एक लेखाकार ब्राह्मण मोग्गल्लान तथागत के पास आया और मैत्रीपूर्वक
अभिदान किया तथा शिष्टाचारों के आदान-प्रदान के उपरान्त एक ओर बैठ गया।
इस प्रकार बैठकर लेखाकार ब्राह्मण मोग्गल्लान ने तथागत से यह कहाः
- ‘‘श्रमण गौतम! जिस प्रकार किसी को इस बहुमंजिले प्रासाद का क्रमिक परिचय
प्राप्त होता है, एक क्रम के अनुसार एक क्रमबद्ध के बाद दूसरा और इसी तरह
सीढि़यों के ठीक अन्तिम पायदान तक पहुंचा जाता है। उसी प्रकार हम ब्राह्मण्
ों का भी वेदों के शिक्षा पाठ्यक्रम में क्रमिक प्रशिक्षण है।’’
- ‘‘श्रमण गौतम! जिस प्रकार धुनर्विद्या के पाठ्यक्रम में होता है, उसी प्रकार हम
ब्राह्मणों में, प्रशिक्षण, विकास, प्रस्ताव सभी क्रमशः हैं, उदाहरण-स्वरूप, जैसे
गणना में।
- ‘‘जब हम एक शिष्य अपनाते हैं हम उसे इस प्रकार गणना करने को कहते
हैंः ‘एक का एक, दो दूनी (चार), तीन तिया (नौ), चार चौके (सोलह) और