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इसी प्रकार सौ तक।’ श्रमण गौतम! क्या आपके लिये यह सम्भव है कि आप
अपने धम्म में अपने अनुयायियों के लिये एक इसी प्रकार प्रशिक्षण को निर्दिष्ट
कर सकें।’’
- ‘‘यह ऐसा ही है ब्राह्मण! ब्राह्मण, एक चतुर अश्व-प्रशिक्षक का उदाहरण लो।
वह एक नसलदार अश्व को हाथ में लेता है। वह सबसे पहले लगाम लगाकर
साधता है और फिर धीरे-धीरे दूसरी बातें सिखाता है।’’
- ‘‘उसी प्रकार, हे ब्राह्मण! तथागत हाथों में एक ऐसे मनुष्य को लेते हैं, जिसे
प्रशिक्षित करना होता है और उसे उसका पहला पाठ इस प्रकार देते हैंः आओ,
भिक्षु! शीलवान् रहो। प्रातिमोक्ष के नियमों से पालन की शिक्षा देते हैं।’’
- ‘‘सदाचरण के पालन में कुशल बनो। छोटे-छोटे दोषों में भी संकट देखो।
प्रशिक्षण ग्रहण करो और विनय से परिपूर्ण शिष्य बन जाओ।’’
- जैसे ही वह इन सब में निपुण हो जाता है, तथागत उसे उसका दूसरा पाठ
इस प्रकार देते हैं, ‘‘आओ भिक्षुओं! आँखों से किसी रूप को देख कर, उसके
सामान्य स्वरूप या उसके विवरण से आकर्षित मत होओ।’’
- ‘‘उस प्रवृत्ति के निग्रह पर दृढ़ रहो, जो असंयत चक्षु-इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न तृष्णा
के कारण होती है, ...... ये कुप्रवृतियाँ हैं, पेन्सित्त की अकुशल अवस्थाएं आदमी
पर बाढ़ की तरह काबू पा लेती हैं चक्षु-इन्द्रिय को संयत रखो। चक्षु-इन्द्रिय
को काबू में रखो।
- ‘‘और इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के विषय में सावधान रहो। जब तुम कान से
कोई शब्द सुनो, या नाक से कोई गन्ध सूँघो, या जीभ से कोई स्वाद चखो,
या शरीर से किसी स्पर्शनीय वस्तु को स्पर्श करो और जब मन में तत्संबंधी
संज्ञा पैदा हो, तो उसके सामान्य स्वरूप या उसके विवरणों से आकर्षित मत
होओ।’’
- जैसे ही वह उन सबमें निपुण हो जाता है, तथागत उसे अगला पाठ इस प्रकार
देते हैं, ‘आओ भिक्षुओ! भोजन में मात्रज्ञ हो। क्या तुम अपना भोजन गम्भीरता
और सावधानी से ग्रहण करते हो? न खेल के लिये, न आसक्ति के लिये, न
व्यक्तिगत आकर्षण को बढ़ाने के लिये या शरीर की चारुता के लिये, बल्कि
इसे शरीर की स्थिरता के लिये, इसकी सहायता के लिये, हानि से सुरक्षा के
लिये और सदाचरण जीवन का पालन करने के लिये ही यह करें। इस विचार के
साथ, मैं अपनी पूर्व वेदना को नियंत्रित करता हूँ। मैं किसी नयी वेदना को उत्पन्न
नहीं होने दूँगा, इसमें मेरी जीवन यात्रा अनुरक्षित और सूखपूर्वक होगी।’’